सदा रहें गर्भस्थ शिशु की तरह समर्पित

जिस पल हमें विश्वास हो जाएगा कि हम ईश्वर के भीतर ही हैं और वह तो हमें मिला हुआ ही है तब हमारी आनंद की खोज समाप्त हो जाएगी और हम स्वयं आनंद हो जाएंगे।
क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि किसी भी गर्भस्थ शिशु को अपने लिए या किसी और के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता, फिर भी सहज और स्वाभाविक रूप से उसका विकास अच्छी तरह होता है और वह अपनी जैविक माँ के गर्भसे बाहर संसार में आता है। शैशव काल में बिना हमारी किसी मांग के हमारी माता हमारा पालन-पोषण करती है, लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारा व्यक्तित्व बनता है और हम स्वयं को कर्ता समझने लगते हैं।
वास्तविकता यह है कि अपनी माँ के गर्भ से बाहर आने के बाद भी ब्रह्मांडीय दिव्य माँ के गर्भ में रहते हैं और जिस प्रकार हमारी रक्षा तथा विकास माँ के गर्भ के भीतर विभिन्न नलियों और फ्लूइड के माध्यम से होता है, उसी प्रकार हमारे चारों तरफ जो स्पेस है, वह सदा हमारी रक्षा करती है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अदृश्य नलियां या ट्यूब्स जीवन भर हमारा लालन-पालन करती हैं।
दिव्यता के गर्भ में सुरक्षित जीवन का अनुभव
समस्या यह है कि अज्ञानता वश और अपने चारों तरफ के वातावरण को देखते हुए हम कभी स्वयं को दिव्यता के गर्भ में महसूस ही नहीं कर पाते हैं, इसीलिए हम उस दिव्यता को समर्पित भी नहीं हो पाते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम सदा से ही गर्भ में हैं और सदा रहेंगे, इसीलिए उत्तेजना, व्याकुलता, परेशानी महसूस होती है। जब तक हम गर्भ में हैं तब तक पूर्ण सुरक्षित हैं। मैं सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान मां के गर्भ में हूं और मेरे सभी अंग-प्रत्यंग, कोशिकाएं पूर्ण सुरक्षित हैं, ऐसा पूर्ण विश्वास हमें निडर, बेफिक्र व स्वास्थ रखता है।
इस ब्रह्मांड में जो भी है, वो सब कुछ ब्रह्मांडीय गर्भ में भी है। इसका आनंद लें और समर्पित रहें। प्रकृति के नियमों के अनुसार हमारे शरीर के भीतर के सभी अंग जिस प्रकार अपने अपने कार्य-व्यापार में लगे हुए हैं, उसी प्रकार हमें बाहर से अपने कार्य-व्यवहार में लगे रहना है, लेकिन हमेशा यह सजगता रखनी है कि हम दिव्य माँ के गर्भ में हैं।
जैसे हम गर्भ में बिना किसी प्रयास के सांस लेते हैं, उसी प्रकार संसार में आने पर भी हमारी सांसें खुद ही आती-जाती रहती हैं। इसके लिए हमें कभी कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है। जब हम यह समझते हैं कि हम सर्वव्यापी माँ के गर्भ में हैं तब सब कुछ अपने आप घटित होता जाता है और हमें किसी प्रकार का तनाव नहीं होता है।
जिसे हम खोजते हैं, वह पहले से ही हमारे भीतर है
दिव्य मां के गर्भ में रहते हुए हम उस दिव्यता को बाहर ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं और इसी भ्रम के कारण कि वह हमसे कहीं दूर है, हम कभी दिव्यता का आनंद नहीं उठा पाते। जैसे जल में रहने वाली मछली जल को ढूंढती है बिल्कुल वैसे ही चारों ओर ब्रह्म से भरे हुए ब्रह्मांड में रहते हुए हम उसे खोजने का प्रयास करते हैं। इसीलिए ज्ञानियों और संतों को हमारी अज्ञानता और बेबसी पर हंसी आती है। कहा भी गया है-
जल बिच मीन, मीन बिच जल निशदिन रहत प्यासी, मोहे देखत आवे हांसी।

हम हर पल परमात्मा के भीतर रहते हुए भी परमात्मा की सुरक्षा व आनंद के प्यासे हैं, यह देखकर सद्गुरु को हंसी आती है कि मनुष्य परमात्मा से ओत-प्रोत है फिर भी वह उसे क्यों ढूंढता है, क्योंकि किसी का भी परमात्मा के बाहर रहना संभव ही नहीं है।
इस प्यास को बुझाने का एक ही तरीका है कि हमेशा यह एहसास करे कि मैं उस दिव्य माँ के गर्भ में ही हूं, जो मिला हुआ ही है, उसे क्या ढूंढना। जिस पल हमें विश्वास हो जाएगा कि हम ईश्वर के भीतर ही हैं और वह तो हमें मिला हुआ ही है तब हमारी आनंद की खोज समाप्त हो जाएगी और हम स्वयं आनंद हो जाएंगे।
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