मौन एवं संयम का पर्याय रहे पूज्य श्री शालीभद्र म. सा.
पज्य श्री शालीभद्र का जन्म 12 अक्तूबर, 1947 को अलवर में पिताश्री रतन चंद संचेती और माता श्रीमती चम्पा देवी के परिवार में हुआ था। आपश्री पाँच बहनों के इकलौते भाई थे। आपश्री का सांसारिक नाम प्रकाश संचेती है। बहुत बड़ा बनने की चाहत में आप अलवर से की संयम सामचारी का आभास भी नहीं है, परन्तु इस दंपति का वैराग्य बहुत पक्का था। 12 वर्ष वैराग्य में रहकर आखिर 1994 में इस दंपत्ति की दीक्षा बहुत ही सादगी और आडंबर रहित जयपुर में संपन्न हुई।
आपश्री का नाम श्री शालीभद्र और जयपुर आए और रत्नों का व्यापार शुरु किया। कुछ ही सालों में आप ने जयपुर् के साथ-साथ भारत के अन्य राज्यों एवं विदेशों में भी खूब ख्याति अर्जित की। आपका आभूषणों का व्यवसाय पचास से अधिक देशों में फैल गया था। आपने अपने व्यवसाय में बहुत धन और यश अर्जित किया। आपका सांसारिक जीवन शाही ठाठ वाला था। बड़े बंगले व विदेशी कारों का काफिला था। घूमने-फिरने के शौकीन थे।
देश में गर्मी सताती तो विदेश में महीनों रहते। आपका ऐसा रुतबा था। आपका विवाह दिल्ली निवासी श्रीमती शशि के साथ किया गया। सन 1982 में आपकी माता ने कहा कि पुत्र, अब बस कर। अब और कितना कमाना है? अब कुछ धर्म कमाई भी करो, साथ तो धर्म ही जाना है, ये धन-दौलत नहीं। अपनी पूज्य माता के वचन सुनकर आपके जीवन में ऐसा मोड़ आया कि धर्म के प्रति अहोभाव जाग गया। ये धन-दौलत सब तुच्छ लगने लगे। धीरे-धीरे आपने व्यवसाय को सीमित करना शुरु कर दिया और सजोड़े सहित आजीवन ब्रह्मचर्य धारण कर लिया।
कठोर तपस्या और संथारा की प्रेरक यात्रा
उसी वर्ष फरवरी में पूज्य जयंती लाल म. सा. जयपुर पधारे। उनके संसर्ग में ज्ञान अर्जित किया और कई व्रत, पछखान अंगीकार किए। पूज्यश्री के वैराग्यपूर्ण धार्मिक उपदेश सुनकर आपकी दिशा बदल गई। आपने और आपकी पत्नी श्रीमती शशि ने दीक्षा लेने का संकल्प किया। आप ज्ञान गच्छाधिपति घोर तपस्वी पूज्यश्री चम्पा लाल म. सा. के पास जयपुर से पैदल किशनगढ़ पहुँचे। गुरुदेवश्री ने फरमाया कि आपने इतना वैभवपूर्ण जीवन जिया है, आपको ज्ञान गच्छ आपकी पत्नी का नाम श्रीशशि प्रभा महाराज रखा गया। आपश्री ने कठोर तप एवं संयम का पालन शुरु किया।
आयंबिल व तेला पारन में सूखी रोटी को पानी में घोलकर पीते थे। फिर तेला शुरु। भयंकर गर्मी में सूर्य की आतापना लेना, सर्दी में खाली बदन रहना, रात भर जागकर कयोत्सर्ग व ध्यान करना आपकी दिनचर्या थी। इतनी कठोर साधना का पालन देखकर आपकी माता को भी वैराग्य आ गया। 2 मार्च, 2006 को आपकी माता श्रीमती चम्पा देवी की दीक्षा हुई और उसके ही सलेखना संथारा भी पच्छक लिया। आपके माता को 24 दिन का संथारा आया। आप प्रसिद्ध जोहरी थे। आपको मालूम था कि सोना आग में तप कर ही शुद्ध होता है।
पूज्य शालीभद्रमुनि म.सा. का संथारा और देवलोक गमन
अतः आप 12 प्रकार के तप से तपकर शुद्ध बनते गये। आपका संयम जीवन बहुत उज्जवल है। आपश्री अधिकांशतः मौन में ही रहे। 2018 में आपश्री बालोतरा पधारे थे और अंतिम समय तक वहीं विराजमान रहे। इस वर्ष 5 नवंबर, बुधवार से आपका संथारा गतिमान था। ज्ञान गच्छाधिपति पूज्य गुरुदेव श्रीप्रकाश चंद्र महाराज सा. भी बालोतरा में ही विराजमान हैं। आपकी इस कठोर साधना का समाचार सुन अपार जन-समूह बालोतरा में उमड़ आया।
इस पंचम् काल में भी उत्त्कृष्ट संयम का पालन हो सकता है, ये आपने दिखला दिया। ज्ञानगच्छाधिपति पूज्य गुरुदेव श्रुतधर पंडित रत्न 1008 श्री प्रकाशचंद्र म.सा. के आज्ञानुवर्ती पूज्य श्री शालीभद्रमुनि म.सा. का इस माह की 20 तारीख की रात्रि 1 बजे बालोतरा में 16 की चोविहार तपस्या में यावज्जीवन संथारा सहित देवलोक गमन हो गया है।
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