शिव-भक्त रावण ने लिखा शिव तांडव स्तोत्र

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(शिव-पुराण)

सावन महीना चल रहा है। इस महीने में भगवान शिव की विशेष पूजा करने की परंपरा है। शिव पूजा में मंत्र जप के साथ ही शिव तांडव स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है। शिव जी को प्रिय शिव तांडव स्तोत्र की रचना रावण ने की थी। रावण को अपनी शक्ति पर अहंकार हो गया था, जिसके कारण वह अपने समक्ष सभी को कमजोर समझने लगा था।

एक दिन वह कैलाश पर्वत पहुंच गया। उस समय शिव जी ध्यान में लीन थे। वह शिव जी को कैलाश पर्वत सहित उठाकर अपने साथ लंका ले जाना चाहता था तो वह कैलाश पर्वत को उठाने लगा। यह देख शिव जी ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत का भार बढ़ा दिया। पर्वत का भार बढ़ने से रावण कैलाश को उठा नहीं सका और उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया।

उसने पर्वत के नीचे दबे अपने हाथ को निकालने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। तब उसने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए शिव तांडव स्तोत्र की रचना की। शिव जी रावण द्वारा रचे गए शिव तांडव स्तोत्र को सुनकर बहुत प्रसन्न हो गए और कैलाश पर्वत का भार कम कर दिया। इसके बाद रावण ने पर्वत के नीचे से अपना हाथ निकाल लिया।

कथा-संदेश

विनम्र बनें

अहंकारवश रावण कैलाश पर्वत उठाने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली और उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया। जब रावण ने अहंकार छोड़कर शिव जी की भक्ति की, तब उसे शिव- कृपा मिली। हम अहंकार का त्याग करके विनम्रता बनते हैं, तो ही भगवान की कृपा मिलती है।

न छोड़ें भक्ति

जब रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया, तब उसने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए भक्ति की। अर्थात शिव तांडव स्तोत्र रचा। फलस्वरूप उसे शिव-कृपा की प्राप्ति हुई और उसका दुःख दूर हो गया। हमें भी संकट के समय में भगवान की भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए।

शिव तांडव स्तोत्र की खास बातें

ये स्तोत्र संस्कृत में है। इसकी लयात्मकता इसे बहुत खास बनाती है। इसमें भगवान शिव के रौद्र रूप, तांडव नृत्य और संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्ति का वर्णन किया है। रावण ने इसमें 17 श्लोकों के माध्यम से शिव की महिमा का गान किया है।

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शिव तांडव स्तोत्र के नियमित पाठ से वाणी सिद्धि, धन-समृद्धि और आत्मबल की प्राप्ति होती है। रोज ब्रह्ममुहूर्त में या शाम को प्रदोष काल में इसका पाठ करना श्रेष्ठ माना जाता है। शिवलिंग के पास दीप जलाकर इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

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