श्रेय की रस्साकशी
भारतीय संविधान का निर्माण एक जटिल और सहयोगपूर्ण प्रक्रिया थी, जिसमें कई व्यक्तियों का योगदान शामिल था। इन दिनों कुछ ऐसी आवाज़ें सुनाई पड़ रही हैं, जो सर बी.एन.राउ को संविधान का असली वास्तुकार मनवाना चाहती हैं। अचरज नहीं कि कइयों को इन आवाज़ों में डॉ.बी.आर.अंबेडकर की भूमिका को कम करने की दूरागत घंटियाँ भी बजती लग रही हैं। कहना न होगा कि यह चर्चा न केवल ऐतिहासिक तथ्यों की पुनर्व्याख्या है, बल्कि वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में भी प्रासंगिक है, जबकि इतिहास के पुनर्लेखन की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
सयाने बता रहे हैं कि सर बी.एन.राउ (1887-1953) एक प्रतिभाशाली सिविल सेवक, न्यायविद और राजनयिक थे। मद्रास विश्वविद्यालय और कैंब्रिज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने 1910 में भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश किया। उन्होंने 1935 के भारत सरकार अधिनियम के मसौदे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1939 में कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने। 1944-45 में वे जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे, जहाँ नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
बी.एन.राउ का प्रारंभिक मसौदा और अंबेडकर की दिशा
संविधान सभा में उनकी नियुक्ति 1946 में संवैधानिक सलाहकार के रूप में हुई। राउ ने अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड और ब्रिटेन की यात्रा कर संवैधानिक विशेषज्ञों से गहन परामर्श लिया। ग़ौरतलब है कि अक्तूबर 1947 में उन्होंने 243 अनुच्छेदों और 13 अनुसूचियों वाला प्रारंभिक मसौदा प्रस्तुत किया, जो भारतीय संविधान का आधार बना। उन्होंने म्यांमार के संविधान का भी मसौदा तैयार किया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
इसमें दोराय नहीं कि भारत के संविधान निर्माण में राउ का योगदान तकनीकी, बुनियादी और प्रारंभिक था। उन्होंने विभिन्न संविधानों का अध्ययन कर एक कार्यकारी ढाँचा प्रदान किया, जिसमें मौलिक अधिकारों को न्यायिक और गैर-न्यायिक श्रेणियों में विभाजित करने का विचार शामिल था, जो आयरिश संविधान से प्रेरित था। हालाँकि, संशोधनवादी दृष्टिकोण में उन्हें जनक बताकर अंबेडकर को मात्र संकलक कहा जा रहा है। लेकिन यह दावा ग़लत है; क्योंकि अंबेडकर ने मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में राजनीतिक सहमति बनाई, विभाजन और महात्मा गांधी की हत्या जैसे संकटों में संविधान को निर्देशित किया।
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संविधान की आत्मा में समानता और सहयोग का संदेश
अंबेडकर ने खुद 25 नवंबर, 1949 के भाषण में राउ के योगदान को स्वीकार किया और कहा कि श्रेय उन्हें नहीं, बल्कि समिति और राउ को जाता है। कहना उचित होगा कि दोनों की भूमिकाएँ पूरक थीं – राउ ने संरचना दी, अंबेडकर ने नैतिक गहराई। कइयों को राउ के योगदान पर नए सिरे से चली चर्चा दलित विमर्श को कमजोर करने का प्रयास प्रतीत हो रहा है। भला यह कैसे भूला जा सकता है कि संविधान निर्माण में अंबेडकर की उपस्थिति ने अनुसूचित जातियों की भागीदारी सुनिश्चित की। यह भी कि राउ ने स्वयं कभी जनक होने का दावा नहीं किया।
वर्तमान में, जब पाठ्यपुस्तकों में इतिहास संशोधन हो रहा है और खोई कड़ियों को खोजने और जोड़ने के प्रयास हो रहे हैं, तो यह चर्चा प्रासंगिक है। संविधान के 75 वर्ष पूरे होने पर, राउ की विचारधारा – जो औपनिवेशिक संरचना को स्वतंत्र भारत के लिए अनुकूलित करती थी – आज भी उपयोगी है। यह हमें याद दिलाती है कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ है, जो सामाजिक न्याय पर आधारित है। वैसे ही जैसे कि अंबेडकर की चेतावनी कि सामाजिक-आर्थिक असमानता राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल सकती है।
संक्षेप में, राउ का योगदान अमूल्य है, जिसका संविधान के इतिहास में समुचित उल्लेख प्रामाणिकता के लिए भी ज़रूरी है। संतुलित दृष्टि से, संविधान सहयोग का प्रतीक है। उसमें सबकी अपनी भूमिका है, जिसे उदारता से स्वीकार किया जाना चाहिए। वर्तमान संदर्भ में, यह चर्चा हमें संविधान की आत्मा – समानता, न्याय और समावेश – को मजबूत करने के लिए प्रेरित करती है। अन्यथा, कहीं हम उस विरासत को न खो दें, जिसने भारत को एकजुट किया।
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