बौखलाहट छोड़ मंथन करिये दीदी, जनता आपके साथ सड़कों पर क्यों नहीं उतरी ?

पश्चिम बंगाल में मिली करारी हार के बाद, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी खुद की सीट भी गंवा दी है, से बौखलाकर उन्होंने गुजरी 5 मई 2026 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि वह सीएम के पद से इस्तीफा नहीं देंगी, क्योंकि वह चुनाव हारी नहीं हैं बल्कि चुनाव आयोग ने भाजपा के साथ मिलकर उनकी 100 सीटें लूटी हैं। उनका यह भी आरोप था कि चुनाव से दो दिन पहले उनके लोगों को गिरफ्तार किया गया और जगह-जगह छापे मारे गये।

जबकि चुनाव संपन्न होने के तुरंत बाद या मतगणना के पहले तक उन्होंने नहीं कहा था कि चुनाव के दो दिन पहले उनके लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यही नहीं जब इस बार के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक बंपर वोटिंग पड़ रही थी, जो आज़ादी के बाद आजतक किसी भी चुनाव में नहीं पड़ी थी, तब उनका ताल ठोककर यही कहना था कि इस बार वह भारतीय जनता पार्टी को बुरी तरह से हराएँगी। उनके मुताबिक प्रदेश में हो रही बंपर वोटिंग भाजपा द्वारा किये गये एसआईआर साजिश का बदला है।

भाजपा और सहयोगियों को 208 सीटों के साथ स्पष्ट बढ़त

उनके मुताबिक भारी तादाद में मतदाता उन्हें जिताने के लिए घरों से निकले हैं ताकि भाजपा की कोई मंशा पूरी न हो सके। लेकिन मतगणना के बाद जब रिजल्ट आया, तो सन्नाटा छा गया। भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने मिलकर प्रदेश में 208 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस और उसके गिने-चुने साथी मिलकर कुछ 80 सीटें ही जीत सके, जबकि दोनों के वोट प्रतिशत में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है।

भाजपा को जहां 45.84 फीसदी वोट मिले हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस को करारी हार के बाद भी 41.08 फीसदी वोट मिले हैं। इस तरह देखा जाए तो कुल 4 फीसदी का ही फर्क है। अगर समय रहते ममता बनर्जी थोड़ी-सी विनम्र होकर कांग्रेस के साथ गठबंधन कर ले लेतीं (महज 10 सीटों पर गठबंधन स्वीकार कर लेतीं) तो आज शायद उनकी यह हालत नहीं होती। क्योंकि कांग्रेस को इस चुनाव में भले महज 2 सीटें मिली हों, लेकिन उसे 2.97 फीसदी मत मिले हैं।

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गठबंधन राजनीति बनाम एकतरफा चुनावी रणनीति की तुलना

यही नहीं अगर पश्चिम बंगाल के बाहर जिस तरह वह वामदलों के साथ एकजुट होने के लिए तैयार हैं, क्योंकि उनका कहना है कि भाजपा को हराने के लिए कुछ भी किया जा सकता है, तो पश्चिम बंगाल में भी अगर थोड़ा-बहुत एडजेस्ट कर लेतीं, तो शायद आज जीत का सेहरा तृणमूल कांग्रेस के सिर पर होता। लेकिन चुनाव के समय तो ममता दीदी यही कह रही थीं कि वो प्रदेश में सारे दलों की छुट्टी कर देंगीं, उन्हें निर्णायक बहुमत मिलने जा रहा है। लेकिन अब जबकि जनता ने उनको हकीकत का आईना दिखा दिया है, तो वह इस चुनाव में मिली हार को मानने के लिए तैयार नहीं हैं।

एक और बात गौर करने लायक है कि ममता बनर्जी ने बार-बार कहा है कि भाजपा चुनाव आयोग के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल में वोटों की डकैती डाल रही है और प्रदेश के मतदाता इसे किसी भी रूप में नहीं स्वीकार करेंगे। उन्होंने कहा था कि मतदाता चीख-चीखकर उनके साथ होने की हामी भर रहे हैं, लेकिन क्या ये हैरानी की बात नहीं है कि उनकी करारी हार के बाद प्रदेश में कहीं भी मतदाता सड़कों पर नहीं उतरे।

उस भवनीपुर में भी टीएमसी के पक्ष में हजार लोग सड़कों पर नहीं निकले, जहां वह खुद 15000 से ज्यादा वोटों से हार गईं। सोशल मीडिया पर दिखाए गए आम लोगों के इंटरव्यू में आधे से ज्यादा ने डरकर कैमरे में कुछ कहने से मना कर दिया और ज्यादातर लोगों का कहना था कि टीएमसी कार्यकर्ताओं की गुड़ागर्दी से वो बहुत परेशान हैं। ममता बनर्जी ने जिस तरह से पूरे चुनाव को बाहरी बनाम भीतरी का रंग दिया था, उससे प्रदेश के बाहर के लोग बेहद डरे हुए थे।

दहशत और सुरक्षा की धारणा से वोटिंग पैटर्न में बदलाव

उन्हें लग रहा था कि अगर टीएमसी जीतकर आती है तो उनकी खैर नहीं होगी। इस दहशत ने भाजपा के पक्ष में कुछ प्रतिशत वोट बढ़ाए हों, तो आश्चर्य नहीं। क्योंकि बंगाल की कम से कम 45 सीटों में हिंदीभाषी (बाहरी लोग) हैं। इन सीटों पर टीएमसी पिछली बार के मुकाबले सिर्फ एक तिहाई सीटें ही जीत सकी। इससे साफ पता चलता है कि टीएमसी की इस तरह की हार के पीछे साजिश या बेइमानी से ज्यादा वजह उनके 15 सालों की एंटीइंकमबेंसी थी।

लोग उनसे त्रस्त आ चुके थे, प्रदेश में जिस स्तर की बेरोजगारी और जिस तरह का बाहरी बनाम भीतरी का उन्होंने धुव्रीकरण कर दिया था, उससे लोग डरे हुए थे और उन्होंने अपने डर तथा गुस्से का बदला भाजपा को जिताकर लिया। टीएमसी या ममता बनर्जी जिन मुस्लिम मतदाताओं पर आंख मूंदकर भरोसा कर रही थीं, इस बार वह भी या तो कई जगह पर बंट गया या उनसे कुछ तटस्थ हो गया, वरना मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना में वह हालत न होती, जो हुई।

दरअसल, मुस्लिम वोट कांग्रेस, टीएमसी और असदुद्दीन ओवैसी के बीच बंट गये। इसलिए पिछली बार उन्हें मुर्शिदाबाद रेंज में 44 सीटें मिली थीं, इस बार कुल 32 मिलीं, यह भी उनकी हार का एक बड़ा कारण था। सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस आरजीकर कॉलेज मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था, उस पर तृणमूल सरकार का रवैय्या संदिग्ध रहा और भाजपा ने विक्टिम की माँ को टिकट दिया। इसी बात ने न सिर्फ एक सीट को बल्कि कई सीटों को प्रभावित किया।

हार के बाद आत्ममंथन और जिम्मेदारी तय करने की जरूरत

कुल मिलाकर देखें तो ममता बनर्जी को अपनी बौखलाहट और बचकानेपन को छोड़कर ठंडे दिलोदिमाग से सोचना चाहिए कि आखिर उनकी इस बुरी तरह से हार के लिए कौन जिम्मेदार है और अब कैसे खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करें। लोकतंत्र का यही ताकाजा है, लेकिन वह बचपना दिखाते हुए कह रही हैं कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगी। वह जानती हैं कि इस्तीफा देने या न देने से कुछ नहीं होगा। पश्चिम बंगाल की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल सिर्फ आज तक है।

इसके बाद अगर उन्होंने यही रवैय्या बरकरार रखा तो राज्यपाल विधानसभा को भंग कर देंगे तब वह खुद-ब-खुद मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी, क्योंकि यही संवैधानिक है और ममता बनर्जी बार-बार संविधान की दुहाई देती रही हैं।

-वीना गौतम
-वीना गौतम

इसलिए उन्हें यह बचकानी हरकत करने के बजाय गरिमा के साथ इस्तीफा देना चाहिए और जैसाकि वह खुद कहती हैं, वह शेरनी हैं, जो कभी अपना इलाका नहीं छोड़ती, तो उन्हें फिर कमर कस लेनी चाहिए और 2029 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करते हुए न सिर्फ पश्चिम बंगाल की हार का बल्कि पूरे देश में भाजपा को हराकर बदला लेना चाहिए। जैसाकि उन्होंने अब कहा भी है कि सोनिया गांधी, केजरीवाल और अखिलेश ने उनसे बात की है और वह अब इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए तैयार हैं। यही कदम उठाना उनके लिए और देश के संवैधानिक मिजाज के लिए भी अच्छा रहेगा वरना सत्ता की ताकत को उनसे भला बेहतर और कौन समझता है।

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