तालिबान-पाकिस्तान संघर्ष : चौकस रहें !

अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच छिड़े अविवेकपूर्ण महायुद्ध के बीच कहीं भारत अपने तुरंत पड़ोस में लगी आग को तो नहीं भूल रहा है न? 26 फरवरी, 2026 की रात ने जिस तरह दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया, उसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक भी साबित हो सकता है! उस रात अफगानिस्तान के तालिबान बलों ने डूरंड लाइन के साथ लगे पाकिस्तानी सीमा चौकियों पर बड़े पैमाने पर हमला बोल दिया था।

तालिबान ने इसे 21 फरवरी को पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों का प्रत्यक्ष जवाब बताया। इन हमलों में तालिबान ने ड्रोन और जमीनी सेनाओं का सहारा लिया। कई पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा कर लिया। भारी नुकसान पहुँचाया। अगले ही दिन, 27 फरवरी को पाकिस्तान ने ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक के तहत काबुल, कंधार और पक्तिया जैसे प्रमुख शहरों पर हवाई हमले किए। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे ओपन वॉर घोषित कर दिया, जबकि तालिबान ने बातचीत की पेशकश की लेकिन चेतावनी दी कि यदि हमले जारी रहे, तो पाकिस्तान के अहम ठिकाने निशाने पर होंगे।

फरवरी में पाकिस्तान में बढ़े आतंकी हमले

सयाने याद दिला रहे हैं कि यह विस्फोटक दौर पिछले हफ्तों की घटनाओं का परिणाम है। फरवरी की शुरुआत में पाकिस्तान में आतंकी हमलों का सिलसिला तेज हो गया। छह फरवरी को इस्लामाबाद की एक शिया मस्जिद पर आत्मघाती हमले में कम से कम 31 लोग मारे गए और 160 से अधिक घायल हुए। यह 2008 के बाद राजधानी पर सबसे घातक हमला था। पाकिस्तान ने इसके लिए अफगानिस्तान से संचालित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को जिम्मेदार ठहराया।

16 फरवरी को बाजौर जिले में टीटीपी के विद्रोहियों ने फ्रंटियर कॉर्प्स की चौकी पर हमला किया, जिसमें 11 सुरक्षा कर्मी और एक बच्चा मारा गया। इन घटनाओं ने पाकिस्तान को उकसाया और 21 फरवरी को उसने नंगरहार, पक्तिका और खोस्त प्रांतों में कथित टीटीपी व आईएस-के कैंपों पर हवाई हमले किए। मार्च की शुरुआत तक झड़पें थमने का नाम नहीं ले रहीं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इन संघर्षों से 66,000 अफगान विस्थापित हो चुके हैं। भारी तादाद में महिलाओं व बच्चों समेत नागरिक मारे गए हैं।

इस संघर्ष का स्वरूप अब, कम तीव्रता वाले युद्ध से आगे, खुले टकराव की ओर बढ़ चुका है। कारण गहरे हैं – डूरंड लाइन (ब्रिटिश काल की कृत्रिम सीमा) पर पुराना विवाद, टीटीपी का पुनरुत्थान (जिसे कथित रूप से तालिबान शरण दे रहा है) और दोनों देशों की आंतरिक कमजोरियाँ। पाकिस्तान की डगमगाती अर्थव्यवस्था और सेना पर दबाव ने उसे आक्रामक बनाया, जबकि तालिबान अपनी संप्रभुता साबित करने को बेताब है। कभी सहयोगी रहे ये दो पड़ोसी अब शत्रु हो चुके हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है।

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पाकिस्तान की अस्थिरता से भारत की सुरक्षा को खतरा

कहना न होगा कि भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। सुरक्षा की दृष्टि से, पाकिस्तान की अस्थिरता टीटीपी, बलूच विद्रोहियों और आईएस-के जैसे समूहों को मजबूत कर सकती है, जो सीधे जम्मू-कश्मीर या पंजाब की सीमाओं तक पहुँच सकते हैं। आईएसआई जैसी एजेंसियाँ भारत-विरोधी तत्वों को सक्रिय करने में लग सकती हैं। यदि पाकिस्तान पूरी तरह कमजोर पड़ता है, तो उसकी सेना आंतरिक संकटों से बचने के लिए भारत पर दबाव डाल सकती है। अर्थव्यवस्था पर भी असर गहरा होगा। अफगानिस्तान भारत का अहम व्यापारिक द्वार है। संघर्ष से सीमाएँ बंद हो रही हैं, शरणार्थी संकट बढ़ रहा है और भारत के 3 अरब डॉलर से अधिक के निवेश को खतरा है। अफगान अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी, तो भारत के हितों को भी नुकसान पहुँचेगा।

कूटनीतिक मोर्चे पर यह भारत के लिए दोधारी तलवार है। नई दिल्ली तालिबान के साथ संबंध मजबूत कर रही है। हालिया उच्च-स्तरीय संपर्क इसका प्रमाण हैं। पाकिस्तान इससे व्यथित है और भारत को विवाद में घसीटने की कोशिश कर रहा है। क्षेत्रीय स्थिरता सबसे अधिक खतरे में है। इससे दक्षिण एशिया में ग्रेट गेम (महाशक्तियों के बीच मध्य एशिया – खासकर अफगानिस्तान – पर प्रभाव और नियंत्रण की बड़ी भू-राजनीतिक होड़) की पुनरावृत्ति हो सकती है, जिससे शरणार्थी संकट, नशीली दवाओं की तस्करी और अनियंत्रित आतंकवाद फैल सकता है। इसलिए भारत को इस वक़्त बेहद चौकस रहने की ज़रूरत है।

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