वैष्णव, शैव एवं सिख धर्म में है उत्सव की तिथि

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भारतीय संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा देवों की उस दीपावली में शामिल होने का अवसर देती है, जिसके प्रकाश से प्राणी के भीतर छिपी तामसिक वृत्तियों का नाश होता है। इसे कार्तिकी पूर्णिमा, त्रिपुरारी पूर्णिमा या गंगा-स्नान के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है।

माना जाता है कि इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। जनमानस में स्थित आसुरी वृत्तियों के नाश व दैवीय शक्तियों के उत्थान के लिए कार्तिक पूर्णिमा को लक्ष्मी-नारायण की महाआरती करके दीप प्रज्ज्वलित करते हैं। इससे हम अपने भीतर देवत्व धारण करके सद्गुणों को समाहित कर सपें, नर से नारायण बन सपें। कार्तिक पूर्णिमा का महत्व वैष्णव, शैव एवं सिख धर्म में भी बहुत ज्यादा है।

भगवान विष्णु का प्रथम मत्स्य अवतार और उसका महत्व

विष्णु भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है, क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। प्रथम अवतार में भगवान विष्णु मत्स्य के रूप धारण किया था। भगवान को यह अवतार वेदों की रक्षा, प्रलय के अंत तक सप्तत्रषियों, अनाज एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा करने के लिए लेना पड़ा था। इससे सृष्टि का निर्माण कार्य फिर से आसान हुआ। शिव भक्तों के अनुसार इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार किया था, जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए।

इससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु ने शिव जी को त्रिपुरारी नाम दिया, जो शिव के अनेक नामों में से एक है। इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। सिख धर्म में कार्तिक पूर्णिमा को प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन सिख संप्रदाय के संस्थापक गुरु नानक देव का जन्म हुआ था। इसे गुरु पर्व भी कहा जाता है। इस तरह यह दिन एक नहीं बल्कि कई वजहों से खास है।

क्षीरसागर-दान का महत्व

इस दिन गंगा-स्नान, दीप-दान तथा अन्य दानों आदि का विशेष महत्त्व है। इसके साथ ही क्षीरसागर-दान का अनंत महत्व है। क्षीरसागर का दान 24 अंगुल के बर्तन में दूध भरकर उसमें स्वर्ण या रजत की मछली छोड़कर किया जाता है। यह उत्सव दीपावली की भांति दीप जलाकर सायंकाल में मनाया जाता है।

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दीपदान का महत्व

स्कन्द पुराण में ब्रह्मा जी ने नारद जी को कार्तिक मास में दीप-दान की महिमा बतायी। उनके अनुसार कार्तिक माह में दीपदान करने से राजसुय यज्ञ और अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इस दिन संध्याकाल में जो लोग अपने घरों को दीपक जला कर सजाते हैं, उनका जीवन सदैव आलोकित प्रकाश से प्रकाशित होता है। उन्हें अतुल लक्ष्मी, रूप, सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। माँ लक्ष्मी ऐसे लोगों के घरों में स्थाई रूप से सदैव निवास करती हैं। इसीलिए इस दिन सभी को अपने घर के आँगन, मंदिर, तुलसी, नल के पास, छतों और चारदीवारी पर दीपक अवश्य ही जलाना चाहिए।

-वैदिक विभूषण ज्योतिषाचार्य पं.मनोज कुमार द्विवेदी

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