कांग्रेस के लिए उलझती जा रही है चुनाव की गुत्थी

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हैदराबाद, ओआरआर के भीतर पहले विभिन्न नगरपालिकाओं का जीएचएमसी में विलय और बाद में उन्हें तीन निगमों में विभाजित करने के बाद समझा जा रहा था कि राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस राज्य की राजधानी के शहरी स्थानीय निकाय में अपनी पकड़ मज़बूत करके शहरी सत्ता पर भी कब्ज़ा करने में सफल होगी, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों से लगता नहीं है कि हैदराबाद के तीनों निगमों पर सत्तासीन होने के लिए हालात कांग्रेस के पक्ष में हैं, बल्कि कांग्रेस के लिए यह गुत्थी लगातार उलझती जा रही है।

पहले हैद्रा और अब आरटीसी की हड़ताल ने जनता में कांग्रेस के लिए संभावनाओं को और कमज़ोर कर दिया है। कांग्रेस को शहर की जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए संघर्ष के दौर से गुज़रना पड़ रहा है। आगामी जीएचएमसी (सीएमसी और एमएमसी भी) चुनावों की संभावनाओं पर पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि संगठनात्मक समस्याओं के कारण स्थानीय निकायों में पार्टी सफल ही होगी, यह कहना मुश्किल है।

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2020 में बीआरएस की सीटें घटीं, भाजपा ने बढ़ाई ताकत

उल्लेखनीय है कि 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पुराने जीएचएमसी क्षेत्र के लगभग 20 विधानसभा सीटों में एक भी सीट नहीं जीत पायी थी। उससे पूर्व 2016 के जीएचएमसी चुनावों में बीआरएस ने 150 में से 99 डिवीजनों में जीत हासिल की थी और उसका अपना मेयर और डिप्टी मेयर था। हालांकि, 2020 के जीएचएमसी चुनावों में उसे झटका लगा और उसकी सीटें घटकर 56 रह गईं, जबकि भाजपा ने 48 सीटें जीतीं।

अब हैद्रा और जीएचएमसी के विलय और विभाजन के बाद विश्लेषकों का मानना है कि हैदराबाद में कांग्रेस की छवि जनता के बीच सकारात्मक नहीं है। पार्टी राज्य की सत्ता में होने के बावजूद जमीनी स्तर पर अभी भी मजबूत नहीं है। उल्लेखनीय है कि पार्टी ने सत्ता में आने के बाद सिकंदराबाद कंटोनमेंट और खैरताबाद के उप चुनाव लड़े तथा दोनों सीटों पर बीआरएस को हराया है, इसके बावजूद कांग्रेस के नेता यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं कि बीआरएस की पकड़ जीएचएमसी परिधि में कमज़ोर हुई है। दूसरी ओर भाजपा भी अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में लगी हुई है।

हालाँकि कांग्रेस लगातार समन्वय बैठकें आयोजित कर रही है। शहर में विकासात्मक गतिविधियों का प्रारंभ, समीक्षा और उद्घाटन जैसे कार्य जारी हैं, लेकिन पार्टी के लिए सकारात्मक छवि बनाने और यह दिखाने के लिए लगता है कि काफी कुछ किया जाना बाकी है। कांग्रेस के स्थानीय नेता ही मान रहे हैं कि कांग्रेस के लिए इस डगर पर स्थिर चलना और मंज़िल को पाना आसान नहीं है।

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