संरक्षित वन क्षेत्र में खनन व अन्य कार्यें पर रोक को हाईकोर्ट ने माना उचित

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने खम्मम ज़िले के संरक्षित वन क्षेत्र में बैरेटीस, डोलमाइटीस, माइनिंग क्रियाकलापों को रोकते हुए वन विभाग द्वारा लिए गए निर्णय का समर्थन करते हुए इसे उचित बताया। वन क्षेत्र में माइनिंग संबंधी क्रियाकलापों पर रोक लगाते हुए वन विभाग द्वारा जारी अधिसूचना को चुनौती देते हुए माइनिंग कंपनियों द्वारा दायर याचिकाओं को उच्च न्यायालय ने खारिज करते हुए अपना फैसला सुनाया। इतना ही नहीं, सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा दी गई रिपोर्ट की प्रामाणिकता को चुनौती देते हुए कुछ और कंपनियों द्वारा दायर याचिकाओं को भी खारिज कर दिया।

कुछ वर्षों से जारी माइनिंग क्रियाकलापों पर रोक लगाते हुए वन विभाग द्वारा जारी अधिसूचना को चुनौती देते हुए कुछ माइनिंग कंपनियों द्वारा वर्ष 2009 से याचिकाएँ दायर की जा रही हैं। इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस नागेश भीमपाका ने हाल ही में अपना फैसला सुनाते हुए बताया कि संरक्षित वन भूमि को सरकारी भूमि के रूप में वर्गीकृत करते हुए राजस्व अधिकारियों द्वारा की गई गलती के कारण यह विवाद उत्पन्न हुआ है।

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राजस्व अधिकारियों की लापरवाही के कारण 1962 से लगभग 760 एकड़ विस्तारित भूमि पर माइनिंग क्रियाकलाप बिना रोक-टोक के चल रहे हैं। इस कारण गार्ला के वन क्षेत्र को नुकसान हुआ है। सरकार की दलील के अनुसार, माइनिंग से संबंधित क्षेत्र संरक्षित वन क्षेत्र का भाग है, तत्कालीन निजाम सरकार ने 17 अगस्त, 1951 को इसे नोटिफाइड किया था। वर्ष 2013 में उच्च न्यायालय के आदेश के चलते सर्वे ऑफ इंडिया ने सर्वे कर अपनी रिपोर्ट पेश की। सर्वे रिपोर्ट और 1951 की अधिसूचना के अनुसार 762 एकड़ भूमि को वन भूमि निर्धारित किया गया है, इस आधार पर कंपनियों द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए अदालत ने अपना फैसला सुनाया।

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