श्राद्ध की कथा

मनुष्य कितना भी अपनी वृत्तियों को सात्विक बना ले, अपने आचार-व्यवहार को शुद्ध बना ले, परंतु उसकी एक गलती उसके विनाश का कारण बन जाती है। सारा जीवन मनुष्य स्वयं को साधता रहे तभी अन्तिम समय में भी उसकी वृत्तियाँ सात्विक बनी रहती हैं अन्यथा अंतकाल में उसका मन सांसारिक विषयों में भटक जाता है। उसकी वृत्ति उसके पतन का कारण बनती है। इसीलिए मृत्यु के पथिक की वृत्ति को ईश्वर की ओर उन्मुख करने का प्रयास किया जाता है।

बोधकथा

एक मनुष्य को अपनी अंतिम भौतिक कामना को पूर्ण करने के लिए लकड़बग्घे का जन्म मिला। उसके श्राद्ध कर रहे पुत्र को एक संत ने सन्मार्ग दिखाकर उसकी आँखें खोल दीं। घूमते हुए, एक संत उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ कोई धनी व्यक्ति अपने पिता का श्राद्ध करने के लिए भंडारा कर रहा था। सेठ ने उस संत का आदर-सत्कार किया। संत ने सेठ से पूछा, ‘सेठ जी! यह भंडारा किस लिए कर रहे हो?’

सेठ ने उत्तर दिया, ‘आज मेरे पिताजी का श्राद्ध है, इसलिए गरीबों के भोजन हेतु भंडारा कर रहा हूँ।’ संत ने उससे पूछा, ‘क्या आपके पिताजी जीवित हैं ?’ सेठ हँसते हुए कहने लगा, ‘महात्मा जी! आप कैसी बात कर रहे हैं? क्या आप नहीं जानते कि व्यक्ति का श्राद्ध उसकी मृत्यु के उपरांत किया जाता है।’ संत बोले, ‘परंतु आपके पिता का इस श्राद्ध से क्या लेना-देना? यह भोजन जो आप गरीबों को खिला रहे हो, क्या गारंटी है कि यह आपके पिता को तो मिला है या नहीं। वह तो अब भी भूखा बैठा हुआ है।’

संत का वचन और सत्य की परीक्षा

सेठ ने आश्चर्यचकित होकर संत से पूछा, ‘आप कैसे कह सकते हैं कि मेरे पिता को भोजन नहीं मिला और वे भूखे हैं? मेरे पिता कहाँ हैं, क्या आप जानते हैं?’ संत ने सेठ से कहा, ‘आपके पिता यहाँ से पचास कोस दूर जंगल में एक झाड़ी में बैठे हैं। उन्हें लकड़बग्घे का जन्म मिला है। तुमने इतने लोगों को भोजन करवाया ताकि वह भोजन तुम्हारे पिता को मिले, परंतु वह तो कई दिनों से भूखे हैं। यदि मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो जंगल में जाकर स्वयं अपनी आँखों से देख लो।’

सेठ ने संत से पूछा, ‘मैं यह कैसे जानूँगा कि वह लकड़बग्घा ही मेरे पिता हैं?’ संत ने आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘जब तुम जंगल में उनके सामने जाओगे तो मेरे आशीर्वाद से वह तुम्हारे साथ इंसान की भाषा में बात करेंगे।’ अपनी जिज्ञासा को मिटाने के लिए सेठ जंगल में गया। वहाँ उसने देखा कि एक लकड़बग्घा झाड़ी में बैठा है। सेठ ने उससे कहा, ‘पिता जी ! आप कैसे हैं?’ लकड़बग्घे ने जवाब दिया, ‘बेटा! मैं कई दिनों से भूखा हूँ। मेरे शरीर में बहुत दर्द है, जिसके कारण चलने-फिरने में भी असमर्थ हूँ।’

अंतकाल की इच्छा ही बनाती है अगला जन्म

सेठ ने आश्चर्य से लकड़बग्घे से पूछा, ‘पिताजी ! आप तो बहुत नेक इंसान थे, आपकी धार्मिक प्रवृत्ति जग-जाहिर थी, आपने बहुत दान-पुण्य किया था फिर आपको लकड़बग्घे की योनी क्यों प्राप्त हुई ?’ लकड़बग्घे ने जवाब दिया, ‘बेटा ! यह सत्य है कि मैंने अपनी तमाम उम्र नेक और परोपकार कर्मों में बिताई, परंतु मेरे अंत समय में मुझे माँस खाने की इच्छा हुई। फलस्वरूप मुझे लकड़बग्घे का जन्म मिला।’ इस प्रकार लकड़बग्घे से बातचीत करके सेठ जंगल से घर लौट आया।

वह परिवार सहित संत के समक्ष नतमस्तक हो कहने लगा, ‘आप पूर्ण पुरुष हैं।’आपने मेरा भ्रम दूर करके मुझ पर बहुत भारी अहसान किया है अन्यथा मेरे पिता की ही तरह मेरा जीवन भी अकारण चला जाता।इस चर्चा का सार यह है कि अनावश्यक रूढ़ियों के बोझ को उतारकर फेंक देना चाहिए। जहाँ तक संभव हो, अपने जीवन काल में दान आदि कार्य करना चाहिए। अपने जीवन को प्रभुमय बनाने का यथासंभव प्रयास करना चाहिए। तभी अंतकाल में मनुष्य की वृत्ति ईश्वरोन्मुख हो सकती है।

चन्द्र प्रभा सूद

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