बच्चों को चिड़चिड़ा और आक्रामक बना रहा है ज्यादा स्क्रीन टाइम : अध्ययन

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जयपुर, बच्चों में बढ़ते ‘स्क्रीन टाइम’ को लेकर किये गए एक हालिया अध्ययन से पता चला कि लगभग 72 प्रतिशत बच्चे रोजाना औसतन तीन से छह घंटे तक मोबाइल देखते हैं, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन और आक्रामकता बढ़ रही है। यहां सवाईमान सिंह चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल के मनोचिकित्सा केंद्र के विशेषज्ञों के अध्ययन में यह बात सामने आई।

बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम के असर को समझने के लिए मनोचिकित्सा केंद्र की वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. जयश्री जैन ने करीब एक साल तक केंद्र में आने वाले 10 से 16 साल के 150 बच्चों पर अध्ययन किया। अध्ययन के दौरान बच्चों व उनके अभिभावकों से बातचीत की गयी और उनके व्यवहार का अवलोकन किया गया।

अध्ययन के निष्कर्षों के मुताबिक, ज्यादा स्क्रीन टाइम का असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर दिखाई देने लगा है। इसमें कहा गया कि बच्चों में एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी, अकेलापन, नींद की समस्या देखने को मिल रही है और उनका व्यवहार भी बदलने लगा है।

35 प्रतिशत बच्चों में परिवार के साथ संवाद की कमी देखी गयी

डॉ. जैन ने बताया कि अध्ययन में शामिल 72 प्रतिशत बच्चे रोजाना तीन से छह घंटे मोबाइल का उपयोग करते थे। 60 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे जिनका पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकता था। 48 फीसदी बच्चों के व्यवहार में चिड़चिड़ापन और आक्रामकता दिखी। इसके अलावा 41 फीसदी बच्चे ऐसे थे, जिन्हें देर रात मोबाइल देखने से नींद आने में समस्या हो रही थी। अध्ययन के मुताबिक, लगभग 35 प्रतिशत बच्चों में परिवार के साथ संवाद की कमी देखी गयी।

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मनौवैज्ञानिक ने बताया कि मोबाइल की लत के दौरान बच्चे मोबाइल का उपयोग आवश्यकता से अधिक करने लग गए और उसके बिना उनमें बेचैनी की समस्या नजर आई। अध्ययन के अनुसार, ज्यादा समय मोबाइल पर बिताने वाले बच्चों में इसके उपयोग के बारे में माता-पिता से झूठ बोलना, बार-बार सोशल मीडिया पोस्ट व फीड पर नजर डालना, गुस्सा और चिड़चिड़ापन, परिवार और दोस्तों से दूरी, सोने से पहले मोबाइल का उपयोग और देर रात तक जगना जैसी व्यावहारिक समस्याएं हुईं।

खेल या रचनात्मक गतिविधि नहीं होती तो वह मोबाइल के प्रति आकर्षित होता

यह स्थिति मानसिक और व्यावहारिक निर्भरता का रूप ले सकती है जो किसी भी अन्य लत जितनी गंभीर होती है। डॉ. जैन ने कहा, “सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो मस्तिष्क में डोपामिन छोड़ते हैं जो आनंद का रसायन है। इससे बार-बार मोबाइल देखने की इच्छा जागृत होती है। साथ ही जब बच्चे के पास कोई लक्ष्य, खेल या रचनात्मक गतिविधि नहीं होती तो वह मोबाइल के प्रति आकर्षित होता है।”

बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने के साथ ही उनमें शारीरिक गतिविधि कम देखने को मिली। अध्ययन में पता चला कि ऐसे बच्चों का कक्षा एवं पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता और उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता। उन्होंने बताया कि मोबाइल पर अधिक समय बिताने वाले बच्चों में चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी, नींद की समस्या और सामाजिक अलगाव जैसी परेशानियां बढ़ रही हैं। कई बच्चों में अवसाद और चिंता के लक्षण भी पाए गए।

डॉ. जैन ने कहा, “बच्चों को मोबाइल और स्क्रीन से दूर रखने के लिए परिवार की भूमिका सबसे अहम है। माता-पिता को बच्चों के लिये स्क्रीन टाइम तय करना चाहिए। घर में फोन बास्केट बनाएं। परिवार के सभी सदस्य भोजन के समय फोन को वहां रखें। बच्चों को खेलकूद, किताबें पढ़ने और रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना चाहिए।” (भाषा)

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