उत्तराखंड कोर्ट ने दून घाटी में पारिस्थितिकी जोखिम पर सरकार से जवाब मांगा
नैनीताल, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दून घाटी क्षेत्र में पर्यावरणीय और भूगर्भीय जोखिम को लेकर दायर एक अविलंब सुनवाई अर्जी पर राज्य सरकार से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद् रीनू पॉल द्वारा पूर्व में दायर की गई जनहित याचिका के तहत दायर इस अर्जी पर बुधवार को सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। अर्जी में देहरादून जिले के मसूरी डायवर्जन क्षेत्र और इससे सटे तलहटी क्षेत्रों में भूस्खलन की बढ़ती आशंका तथा अनियमित निर्माण गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त करते हुए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप का अनुरोध किया गया है।
अर्जी में कहा गया है कि इस स्थिति से मानव जीवन, संपत्ति और क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए खतरा पैदा हो गया है। पॉल द्वार दायर जनहित याचिका के अनुसार, संवेदनशील ढलानों पर निर्माण कार्य, स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले भू-धंसाव और झड़ीपानी जैसे क्षेत्रों में जमीन में दरारों आदि से संभावित आपदाओं का जोखिम बढ़ गया है। याचिका में पारिस्थितिकी गिरावट और असुरक्षित शहरी विस्तार के दावों को प्रमाणित करने के लिए खबरों, उपग्रह छवियों, भू-टैग वाली तस्वीरों और आधिकारिक दस्तावेजों को आधार बनाया गया है।
इसमें कहा गया है कि देहरादून मास्टर प्लान में पहली बार भूकंपीय ‘फॉल्ट लाइन’ चिह्नित की गई हैं, जिससे भूवैज्ञानिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं। वर्ष 2021 में इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) के अध्यक्ष और देहरादून नगर आयुक्त को इन क्षेत्रों का निरीक्षण करने तथा अवैध निर्माणों को सील करने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने अधिकारियों को अनधिकृत ठेकेदारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने और मामले में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी आदेश दिया था। (भाषा)
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