किसको लाभ पहुंचाएगा, कांग्रेस और आरजेडी में सीट बंटवारे का घमासान?
बताया जा रहा है कि कांग्रेस की आक्रामक स्थिति को देखते हुए आरजेडी ने भी अब कड़ा रुख अपना लिया है। तेजस्वी यादव ने मुजफ्फरपुर की एक रैली में सभी 243 सीटों पर लड़ने का बयान देकर कांग्रेस की मांग पर पलटवार किया। हालांकि, यह बयान एक तरह की दबाव की रणनीति भी हो सकती है लेकिन इसके जरिए तेजस्वी ने कांग्रेस को साफ संकेत दे दिया है कि आरजेडी गठबंधन में सबसे बड़े हिस्सेदार के रूप में अपनी स्थिति को कमजोर नहीं होने देगा। आरजेडी सूत्रों का कहना है कि 2020 में कांग्रेस के खराब स्ट्राइक रेट के कारण ही महागठबंधन सत्ता में आने से चूक गया था। आरजेडी के सख्त होने की एक वजह यह भी है कि कांग्रेस ने अब तक तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में खुल कर समर्थन नहीं दिया है। कांग्रेस की यह चुप्पी भी आरजेडी और तेजस्वी के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है।
बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा दोनों गठबंधनों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। एनडीए में जीतनराम मांझी अब 20 सीटों के लिए अड़े हुए बताए जा रहे हैं। चिराग पासवान की पार्टी लोजपा-आर को न सिर्फ सीटें चाहिए बल्कि अब तो वे सीएम पद की रेस में भी शामिल हो गए हैं। चिराग के बहनोई सांसद अरुण पासवान की नजर में चिराग सीएम पद के लिए फिट कैंडिडेट हैं। मांझी ने अधिक सीटें मांगने के पीछे के कारण भी बता दिए हैं।
उनका कहना है कि पार्टी को सदन में मान्यता के लिए कम से कम 8 सीटों पर जीतना जरूरी है और यह तभी संभव होगा, जब उनकी पार्टी को 20 या इससे अधिक सीटें मिलें। जानकारों के अनुसार एनडीए का तो रिकॉर्ड ही रहा है कि टिकट बंटवारे से पहले खूब चिल्ल-पौं मचती है लेकिन जिसे जितनी सीटें मिलती हैं, वे उससे ही संतुष्ट हो जाते हैं। सबसे मुश्किल हालात 8 विपक्षी दलों के इंडी महागठबंधन में पैदा हो गए हैं। कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीट बंटवारे की शर्तों को लेकर घमासान मचा हुआ है।
आरजेडी-कांग्रेस में सीट बंटवारे को लेकर विवाद
महागठबंधन के दो सबसे बड़े घटक दल राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर तलवारें तन गई हैं। अव्वल तो कांग्रेस तेजस्वी को चुनाव से पहले सीएम फेस घोषित करने को तैयार नहीं जबकि तेजस्वी खुद को सीएम फेस बताते रहे हैं। बिहार अधिकार यात्रा पर निकले तेजस्वी कांग्रेस की चुप्पी के बावजूद अपने को भावी सीएम के रूप में पेश कर रहे हैं। पहले भी वे कई बार यह बात कह चुके हैं। राहुल के साथ वोटर अधिकार यात्रा के दौरान उन्होंने यहां तक कह दिया था कि राहुल को पीएम और उन्हें सीएम बनाने के लिए वोट कीजिए।
जहां तक सीटों का सवाल है तो कांग्रेस 2020 की तरह मनपसंद 70 सीटें तो चाहती ही है, साथ ही अब उप मुख्यमंत्री का पद भी मांगने लगी है। दोनों दलों के बीच तनातनी का आलम यह है कि सीट बंटवारे के मुद्दे पर 15 सितंबर को होने वाली महागठबंधन की बैठक टालनी पड़ी। अब तेजस्वी यादव ने भी सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। खींचतान से महागठबंधन में दिख रही दरार अगर टूट की बुनियाद बन जाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
कांग्रेस की शर्तें और महागठबंधन में दबाव
जानकारी के अनुसार सीटों की संख्या के लिए आरजेडी के सामने कांग्रेस ने 2020 को आधार बनाने की शर्त रखी है। तब कांग्रेस को महागठबंधन में 70 सीटें मिली थीं। कांग्रेस का कहना है कि उसे जो सीटें दी गईं, उसमें आधी से अधिक कमजोर सीटें थीं। इसलिए उसने टिकट बंटवारे में अच्छी-बुरी सीटों में संतुलन बनाने की दूसरी शर्त रखी है। 2020 में कांग्रेस केवल 19 सीटें जीत पाई थी। उसके खराब स्ट्राइक रेट को महागठबंधन की हार का एक मुख्य कारण माना गया था।
कांग्रेस का कहना है कि उसे आधी से अधिक वैसी कमजोर सीटें मिली थीं जिसकी वजह से उसका स्ट्राइक रेट खराब रहा। कांग्रेस ने अपने लिए उप मुख्यमंत्री पद की तीसरी शर्त रखी है। महागठबंधन में शामिल वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी भी डिप्टी सीएम पद के लिए पहले से ही हाय-तौबा मचाए हुए हैं। साहनी तो यहां तक कहते हैं कि अगर तेजस्वी सीएम बनेंगे तो उनका डिप्टी सीएम बनना पक्का है।
कांग्रेस की शर्तों से यह साफ है कि कांग्रेस अब बिहार में अपने को आरजेडी का पिछलग्गू बनाए रखने से बचना चाहती हैं। राहुल की वोटर अधिकार यात्रा की कथित सफलता से कांग्रेस का मनोबल मजबूत हुआ बताया जा रहा है। इसलिए वह अब आरजेडी से पीछे नहीं रहना चाहती। जानकारों की मानें तो राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में उमड़ी भीड़ ने बिहार कांग्रेस में नया जोश भर दिया है।
संकट में महागठबंधन: कांग्रेस और तेजस्वी के बीच टकराव
कांग्रेस को लगता है कि इस यात्रा ने गठबंधन की स्थिति को मजबूत किया है और इसी आत्मविश्वास के साथ वह आरजेडी पर ज्यादा दबाव डाल रही है। वोटर अधिकार यात्रा में महागठबंधन के सभी टॉप लीडर शामिल हुए थे। तेजस्वी लगातार 16 दिन उनके साथ रहे। यात्रा का समापन पटना में सड़क मार्च के साथ हुआ जिसमें महागठबंधन की सम्मिलित ताकत थी। नतीजतन यात्रा में उनके समर्थकों की खूब भीड़ उमड़ी। संभव है कि कांग्रेस को इससे राहुल का करिश्मा और अपनी बढ़ी ताकत का भ्रम हुआ है जिसकी वजह से टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस नई और आक्रामक शर्तें थोपने लगी है।
बताया जा रहा है कि कांग्रेस की आक्रामक स्थिति को देखते हुए आरजेडी ने भी अब कड़ा रुख अपना लिया है। तेजस्वी यादव ने मुजफ्फरपुर की एक रैली में सभी 243 सीटों पर लड़ने का बयान देकर कांग्रेस की मांग पर पलटवार किया। हालांकि, यह बयान एक तरह की दबाव की रणनीति भी हो सकती है लेकिन इसके जरिए तेजस्वी ने कांग्रेस को साफ संकेत दे दिया है कि आरजेडी गठबंधन में सबसे बड़े हिस्सेदार के रूप में अपनी स्थिति को कमजोर नहीं होने देगा।
आरजेडी सूत्रों का कहना है कि 2020 में कांग्रेस के खराब स्ट्राइक रेट के कारण ही महागठबंधन सत्ता में आने से चूक गया था। आरजेडी के सख्त होने की एक वजह यह भी है कि कांग्रेस ने अब तक तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में खुल कर समर्थन नहीं दिया है। कांग्रेस की यह चुप्पी भी आरजेडी और तेजस्वी के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है। तेजस्वी ने अपनी बिहार अधिकार यात्रा में महागठबंधन के सहयोगी दलों को शामिल नहीं किया है हालांकि राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में महागठबंधन के सभी दल साथ थे।
महागठबंधन में कांग्रेस-आरजेडी के बीच बढ़ती खींचतान
महागठबंधन में कांग्रेस और आरजेडी के अलावा वाम दल और अन्य छोटे दल भी सीटों की मांग कर रहे हैं। ऐसे में आरजेडी के लिए सभी को संतुष्ट करना मुश्किल होगा। हालांकि यह भी सच है कि दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच अभी तक आमने-सामने बात नहीं हुई है। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ही गठबंधन को लेकर अंतिम फैसला लेंगे।
दोनों ही नेता जानते हैं कि एकजुट होकर लड़ना ही एनडीए को हराने का एकमात्र तरीका है पर कांग्रेस ने जिस तरह हरियाणा और दिल्ली में इंडिया ब्लॉक के सहयोगी आम आदमी पार्टी से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया, उससे महागठबंधन में टूट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और लोकसभा चुनाव के बाद बढ़ी अपनी स्थिति को भुनाना चाहती है।

वहीं बिहार में आरजेडी सबसे बड़े दल के रूप में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना चाहती है। दोनों के बीच की खींचतान से गठबंधन का क्या होगा, इसके बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या दोनों दल आपसी सहमति से कोई समाधान निकाल पाएंगे या यह आंतरिक कलह महागठबंधन में टूट का सबब बनेगा लेकिन संभव है हालातों को देखते हुए दोनों दल सकारात्मक निर्णय कर ही लेंगे।
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