कार्पोरेट जगत में चयन के लिए ‘ईक्यू’ इतना ज़रूरी क्यों ?

इन दिनों मल्टीनैशनल कंपनियों में इमोशनल इंटेलीजेंस (ईक्यू) चयन प्रािढया का अहम कारक बन गया है। सवाल है आखिर इमोशनल इंटेलीजेंस को इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है? विशेषज्ञों की मानें तो कॉर्पोरेट जगत में कामयाबी के लिए सिर्फ तकनीकी योग्यता से काम नहीं चलता।

लंबी अवधि की सफलता, नेतृत्व क्षमता, टीम सहयोग और तनाव प्रबंधन हर चीज के लिए सबसे ज़रूरी कारक इमोशनल इंटेलीजेंस ही है। यही कारण है कि आज कॉर्पोरेट जगत में चयन के दौरान ‘आईक्यू’ से कहीं ज्यादा ‘ईक्यू’ को अहमियत दी जा रही है।

ग्लोबल टीम मैनेजमेंट में ईक्यू की बढ़ती अहमियत

दरअसल, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कर्मचारी किसी एक देश या एक क्षेत्र के नहीं होते। वो कई देशों, कई संस्कृतियों और कई भौगोलिक विशिष्टताओं वाले होते हैं। ऐसे में उनमें आपस में सहयोग, सहनशीलता और भावनात्मक समझ के बिना कोई कामयाब टीम कैसे बन सकती है? दरअसल, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में एक उत्साही और काम में सौ फीसदी देने वाली टीम के विकास के लिए टीम लीडर के पास आईक्यू से ज्यादा ईक्यू की ज़रूरत होती है, ताकि टीम के कर्मचारियों के बीच आपस में किसी तरह की गलतफहमियां न पैदा हों, जिससे कि प्रोजेक्ट में डिले न हो।

तनाव में संयम और नेतृत्व के लिए ज़रूरी है उच्च ईक्यू

ऐसे में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कर्मचारियों के टीम को लीड करने के लिए ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत होती है, जिसका इमोशनल इंटेलीजेंस लेबल काफी अच्छा हो, जिसमें विभिन्न सांस्कृतिक विविधता वाले कर्मचारियों के बीच तालमेल बिठाना आता हो। इसलिए आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ऐसे ग्लोबल लीडर चुने जा रहे हैं, जिनका ईक्यू लेबल आईक्यू से भी अच्छा हो।

जिन लोगों का ईक्यू(इमोशनल कोशेंट) स्कोर बेहतर होता है, वे मुश्किल के समय उन लोगों से बेहतर संयम का प्रदर्शन करते हैं, जिनका इंटेलीजेंस कोशेंट यानी ईक्यू बेहतर होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम का दबाव काफी ज्यादा होता है, लगातार डेडलाइन का प्रेशर होता है और टारगेट के साथ क्वालिटी वर्क की भी बहुत डिमांड रहती है, ऐसे में मोटीवेशन की ज़रूरत पड़ती है और यह मोटीवेशन कोई ईक्यू यानी इमोशन इंटेलीजेंस में बेहतर लीडर ही बनाए रख पाता है।

इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों में जब टीम लीडर चुनने की बात आती है, तो बेहतर ईक्यू वाले लोगों को तरजीह दी जाती है। क्योंकि माना जाता है कि ऐसे लोग तनाव के समय पैनिक नहीं करते, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हैं, समाधान केंद्रित सोच को अपनाते हैं और सबसे बड़ी बात यह होती है कि ऐसे लोग अपने को तो कठिन समय पर संभालते ही हैं, साथ ही ऐसे लोग कठिन समय पर अपने टीम के लोगों को भी बेहतर ढंग से संभालना जानते हैं।

एक बात यह भी है कि आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों या लीडर की ज़रूरत नहीं है, जो कड़क आदेश देने वाला हो। उन्हें आज की तारीख में ऐसे कर्मचारी और टीम लीडर चाहिए होते हैं, जो अपने सहयोगियों से काम लेते समय उन्हें आदेश न देकर उन्हें इंस्पायरिंग गाइड दें।

ग्लोबल लीडरशिप में ईक्यू से होती है ग्राहक और टीम की बेहतर समझ

आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने ग्लोबल टीम लीडर से चाहती हैं कि वह दूसरों यानी अपने सहयोगियों की प्रतिभा पहचानने में देर न करें, उन्हें हर ज़रूरी समय मोटीवेट कर सकें और अगर संघर्ष की स्थिति बन जाए तो वह संतुलन बनाने में माहिर हो।
कस्टमर को हैंडिल करने, क्लाइंट को अपने पास बनाए रखने आदि में भी बेहतर ईक्यू वाले लोग ज्यादा कामयाब साबित होते हैं।

इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कर्मचारियों को लीड करने वाले प्रबंधक का चुनाव करते समय इन बातों को खास तौरपर तरजीह देते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनी के कर्मचारियों को अकसर क्लाइंट फेशिंग रोल से पाला पड़ता है। ऐसे में अगर उनमें ईक्यू लेबल नहीं होगा, तो वे कामयाब नहीं हो पाएंगे।

ग्राहक संबंध और एआई युग में ईक्यू की बढ़ती भूमिका

आज की तारीख में क्लाइंट की ज़रूरतें और भावनाओं को समझने के लिए आपका इमोशनल इंटेलीजेट होना ज़रूरी है, क्योंकि कम्प्लेन या नाराजगी को संवदेनशीलता से संभालने में ज्यादा कामयाबी मिलती है। यही हाल अपने ग्राहकों के साथ लंबे समय का रिश्ता बनाने के लिए भी ज़रूरी होता है।

लॉन्ग टर्म रिलेशन बनाने में आईक्यू ज्यादा मददगार नहीं होता, लेकिन ईक्यू के बिना तो काम ही नहीं चल सकता। यही वजह है कि ईक्यू से लैस कोई व्यक्ति आज अपने आपमें एक लोकप्रिय ब्रांड की माफिक होता है। लोग उसकी तरफ उसके स्वभाव के जादू के चलते खिंचे चले आते हैं।

जैसा कि हम सब जानते हैं सभी क्षेत्रों की तरह कॉर्पोरेट दुनिया भी एआई के हस्तक्षेप से बहुत तेजी से बदल रही है। ऐसे बदलावों के दौरान ईक्यू वाला कर्मचारी बहुत जल्द अनुकूल स्थितियां बनाने में कामयाब होता है। वह खुद तो किसी भी तरह के हालात से जल्द से जल्द सहज हो ही जाता है, अपने साथ के दूसरे लोगों को भी सहज बना लेता है।

परिवर्तन में अवसर खोजने और टीम संतुलन में ईक्यू की भूमिका

ऐसा व्यक्ति हमेशा डर की जगह अवसर देखता है। वास्तव में एआई के कारण जो एक अनदेखा भय वाला ट्रांजिशन पीरियड आ गया है, ईक्यू से लैस कोई व्यक्ति इस ट्रांजिशन को बिल्कुल सहज बना देता है। इसलिए कंप्लीट रेजोल्यूशन में ईक्यू की भूमिका आईक्यू के मुकाबले बहुत ज्यादा आगे की होती है।

किसी भी टीम में मतभेद आम बात है, लेकिन ईक्यू से लैस लीडर झगड़े को मौका नहीं देते। वे झगड़े को तूल देने से पहले ही उसे सुलझा लेते हैं। खुद को और दूसरों को समझाकर संतुलन लाते हैं तथा निष्पक्ष समाधान निकालने में आगे होते हैं।

इस सबसे किसी भी बहुराष्ट्रीय कंपनी में वर्क कल्चर बहुत सकारात्मक बनता है। आईक्यू किसी को नौकरी भले आसानी से दिला दे, लेकिन आपको प्रमोशन और स्थायित्व आसानी से तभी हासिल होते हैं, जब आपमें ईक्यू लेबल बेहतर हो।

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चयन प्रक्रिया में ईक्यू परीक्षण बन रहा है निर्णायक आधार

आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैनल इंटरव्यूज में आपसे मुस्कुराते हुए सवाल किया जाता है, आपने आखिरी बार अपने गुस्से को कैसे हैंडिल किया था? ..और ये मामूली सवाल नहीं होता। इसका जवाब आपको सच्चाई से पूर्ण और गंभीरता से देना होता है। क्योंकि ये आपके चयन के लिए मूल प्रश्न भी हो सकता है। ग्रुप डिस्कशन, रोल प्ले, जैसे ईक्यू टेस्ट आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों में चयन के टूल्स हो गए हैं।

यहां तक कि कंपनियां अपने योग्य कर्मचारियों का चयन करने के लिए साइकोमेट्रिक टेस्ट का भी उपयोग करती हैं। यही कारण है कि आजकल मल्टीनैशनल कंपनियों में चयन के लिए इमोशनल इंटेलीजेंस की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो गईं है।

-नरेंद्र कुमार

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