आज भी जारी है डायन हंटिंग !

बिहार के मोतिहारी जिले में भोपतपुर थाना क्षेत्र की एक वृद्ध महिला के साथ हुई अमानवीय घटना समाज के उस कुरूप चेहरे को उजागर करती है, जो सदियों से अंधविश्वास और क्रूरता की सियाही में डूबा हुआ है। एक युवक की असामयिक मृत्यु का ठीकरा इस बुजुर्ग महिला के सिर फोड़ते हुए ग्रामीणों ने उसे डायन करार दिया, बेरहमी से पीटा और नदी किनारे ले जाकर जबरन मल पिलाया! अस्पताल और स्थानीय थाने से कोई मदद न मिलने पर पीड़िता को एसपी के जनता दरबार तक जाना पड़ा। यह घटना मात्र एक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, कानूनी, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक विफलताओं का संयुक्त परिणाम है।

सामाजिक दृष्टि से यह प्रथा ग्रामीण भारत में महिलाओं के प्रति गहरे लैंगिक पूर्वाग्रह और अंधविश्वास की अभिव्यक्ति है। विधवा या अकेली बुजुर्ग महिलाएँ अक्सर निशाना बनती हैं, क्योंकि उन्हें समाज में कमजोर और असुरक्षित माना जाता है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में डायन-प्रथा की घटनाएँ वर्षों से जारी हैं। अशिक्षा और अंधविश्वास का यह घालमेल इतना गहरा है कि बीमारी, फसल की बर्बादी या किसी की मृत्यु को जादू-टोने से जोड़ दिया जाता है। यह प्रथा न केवल मानवाधिकारों का हनन है, बल्कि महिलाओं की गरिमा को कुचलने का एक क्रूर तरीका भी है। बहुत बार लैंगिक कुंठाजनित प्रतिशोध भी!

धार्मिक आस्था की विकृति बनती डायन-प्रथा

आर्थिक दृष्टि से, ये घटनाएँ प्राय गरीबी और संसाधनों की कमी से जुड़ी होती हैं। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव आम है। जब कोई बीमार पड़ता है या मर जाता है, तो लोग ओझा या तांत्रिक की शरण में जाते हैं। ये तथाकथित उपचारक डायन का हौवा खड़ा करके अपनी हैसियत मजबूत करते हैं। गरीबी में जी रही आबादी के लिए यह एक सस्ता और त्वरित समाधान लगता है, लेकिन वास्तव में इससे हिंसा का जक्र चलता रहता है। मोतिहारी जैसी घटनाओं में आर्थिक असमानता और संपत्ति विवाद भी अक्सर छिपे होते हैं, जहाँ डायन का आरोप लगाकर सही दावेदार को साज़िश करके रास्ते से हटा दिया जाता है।

दरअसल, यह प्रथा विभिन्न धार्मिक, आदिवासी या लोक परंपराओं की विकृति है। प्राचीनकाल में डायन जैसी अवधारणाएँ शायद सामाजिक नियंत्रण का साधन थीं, जो आज यह क्रूरता का औजार बन गई हैं। ओझा और बाबाओं का व्यापार फल-फूल रहा है, जो धार्मिक आस्था का दुरुपयोग कर लोगों को भ्रमित करते हैं। यह धर्म के नाम पर अमानवीयता है – करुणा, न्याय और मानवता जैसे सच्चे धार्मिक मूल्यों के धुर विपरीत!

कानून की बात करें तो, बिहार में 1999 का डायन प्रथा निषेध अधिनियम मौजूद है, जो डायन का आरोप लगाने, हमला करने या उत्पीड़न करने को गैर-जमानती अपराध मानता है। केंद्र स्तर पर भी डायन-हंटिंग को रोकने के लिए प्रयास हुए हैं। लेकिन कार्यान्वयन दयनीय है! मोतिहारी की घटना में पीड़िता को थाने और अस्पताल से मदद न मिलना पुलिस और प्रशासन की उदासीनता को दर्शाता है। दुर्भाग्य है कि ऐसे मामलों में अक्सर प्राथमिकी दर्ज नहीं होती या देरी से होती है; तथा न्याय प्रक्रिया लंबी और पीड़िता-विरोधी होती है!

मोतिहारी में अंधविश्वास की हिंसा: वृद्ध महिला को डायन बताकर प्रताड़ना

मनोवैज्ञानिक रूप से डायन हंटिंग भीड़ मनोविज्ञान का परिणाम है। जब पूरा गाँव एक साथ किसी को दोषी ठहराता है, तो सामूहिक पागलपन और दोषमुक्ति की भावना उभरती है। भय और अज्ञान से प्रेरित यह व्यवहार व्यक्ति/समूह को अपनी नैतिकता से अलग कर देता है। विडंबना यह भी कि पीड़िता को अपमानित करने में शामिल लोग बाद में भी इसे सामूहिक न्याय मानते हैं!

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कहना न होगा कि राजनीतिक स्तर पर यह सरकारों की विफलता है। बिहार में शिक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता अभियानों की कमी है। चुनावी राजनीति में ऐसे मुद्दे गंभीरता से नहीं उठते। बल्कि, उठते ही नहीं! स्थानीय नेताओं को अक्सर ओझाओं और प्रभावशाली लोगों से मतलब होता है, इसलिए वे चुप रहते हैं। राज्य सरकार को डायन-प्रथा विरोधी अभियान चलाने चाहिए। लेकिन यह उनकी प्राथमिकता में कहीं है ही नहीं। काश, वे समझें कि मोतिहारी की वृद्धा की त्रासदी मात्र एक घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज की असफलता है।

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