युवा किसी भी तरीके से अध्यात्म से जुड़ें – निकुंज कामरा

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भारतीय प्रसिद्ध भजन गायिका हैं- निकुंज कामरा। वे अध्यात्म में गहरी आस्था रखती हैं। इनका जन्म 5 नवंबर को भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुआ था। वे एक ऐसे परिवार में पली-बढ़ीं, जिसका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था। उनकी माँ एक गफहिणी थीं और पिता व्यवसायी थे। बालिका निकुंज छ साल की उम्र से ही भजन गाने लगीं। दिल्ली, राजस्थान, मथुरा तथा वाराणसी आदि स्थानों पर आयोजित होने वाले धार्मिक कार्पामों में अपनी प्रस्तुतियाँ देने लगी थीं।

सन् 2003 से अपने गुरु श्री विनोद अग्रवाल के सान्निध्य में धार्मिक कार्पामों में अपनी मधुर आवाज से भजन गाने लगीं और वही सिलसिला आज भी क़ायम हैं। उनका मानना है कि ईश्वर प्राप्ति की इच्छा हृदय में उत्पन्न होने की कोई उम्र नहीं होती है। यह तो एक ऐसा स़फर है, जो ना जाने कितने जन्मों से चला आ रहा है। हर जीव के जीवन की सार्थकता श्री ठाकुर जी के चरणों में लीन हो जाने में ही है। निकुंज ने अपनी शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए, आध्यात्मिक जगत में भी पूर्ण योगदान देने का प्रयास किया।

श्री लाडली लाल जू की असीम अनुकम्पा और संतों के आशीर्वाद का ही परिणाम है कि जहाँ-जहाँ भी आप भजन-गायन करती हैं, वहाँ श्रद्धालु हृदय से आपकी सराहना करते हैं। यहाँ तरूण कुमार झंवर द्वारा प्रसिद्ध भजन गायिका निकुंज कामरा से लिया छोटा-सा साक्षात्कार प्रस्तुत है।

आपके जीवन का लक्ष्य क्या है?

श्री ठाकुर जी और श्रीजी मेरे ईष्ट हैं, इसलिए मैं बार-बार उनका नाम लेती हूँ, लेकिन मेरे जीवन का मुख्य लक्ष्य है कि मैं ईश्वर की सेवा करूँ। तन, मन, धन, बुद्धि आदि के द्वारा ईश्वर के काम आऊँ। मेरे द्वारा कोई कार्य करने से लोग ईश्वर से जुड़ते हैं तो मुझे वही कार्य करना है। मेरे कुछ करने से पर्यावरण की रक्षा होती है तो मुझे वही करना है।

निशुल्क कीर्तन करने का कारण क्या है?

कुछ साल पहले ही मेरे माता-पिता का देहांत हो गया है। अब परिवार की ा़जम्मेदारी मुझी पर है। मैं मानती हूँ कि देने वाले ईश्वर हैं। मैं उनका काम कर रही हूं तो जो ठाकुर जी को मेरे परिवार के लिए उचित लगता है, उसी में मैं राजी रहती हूँ। वो ही मेरा पालन-पोषण कर रहे हैं। मैं निशुल्क कीर्तन नहीं करती हूँ। वास्तव में पूरी तरह से उन्हीं के सेवा कार्य द्वारा मेरा घर-परिवार चलता हैँ।

अब तक आपने कितने कीर्तन किए हैं?

मैं इसका कोई हिसाब नहीं रखती हूँ, लेकिन औसतन हर महीने लगभग 10-12 संकीर्तन होते हैं और वह भी अलग-अलग शहरों में किए जाते हैं।

आपको किस आश्रम में रहना पसंद है- गृहस्थ या वानप्रस्थ?

मैं व्यक्तिगत रूप से गृहस्थाश्रम में रहती पसंद करती हूँ, क्योंकि मैं कोई साध्वी नहीं हूँ। मैं मानती हूँ कि इस संसार को सौ प्रतिशत बहुत अच्छे संतों की आवश्यकता है, जिससे आश्रम चल सके, देव कार्य हो सके। देव कार्य के लिए गृहस्थियों की भी ज़रूरत है। जो धर्म कार्य करते हुए, धर्म की राह पर चलकर कमाई करे और उसे अच्छे कार्यों में लगाए। एक अच्छे गृहस्थी के जीवन में अध्यात्म और कमाई दोनों चीज़ों की आवश्यकता होती है। गृहस्थ अच्छा काम करते हुए ईश्वर सेवा में भी अपनी ऊर्जा लगा सकता है।

मैं चाहता हूँ कि आपके अपने शब्दों में युवा वर्ग को कोई संदेश दें

युवाओं से मैं केवल इतना कहना चाहती हूँ कि किसी भी तरीके से अध्यात्म से जुड़ें। आप ध्यान के तौर जुड़ना चाहते हैं, आप पर्यावरण सेवा के तौर जुड़ना चाहते हैं, आप सगुण या साकार प्रभु के रूप में जुड़ना चाहते हैं, आप ठाकुर जी, श्री जी, राम जी, शिव जी या अलौकिक शक्ति को मानते हैं, आप कुछ भी मानें, लेकिन अपने जीवन का कुछ समय उसे ज़रूर दें, क्योंकि आपके जीवन में जो कुछ भी अच्छा या बुरा हो रहा है, उसका सामना करने के लिए आत्मबल की आवश्यकता होती है, जो आध्यात्मिक ऊर्या द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। इसलिए किसी भी माध्यम से भगवान से जुड़ना चाहिए।

डेली हिन्दी मिलाप समाचार-पत्र की 75वीं वर्षगाँठ के अमृत महोत्सव पर पाठकों को आपका संदेश?

हिन्दी मिलाप समाचार-पत्र की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष में, मैं इतना ही कहना चाहूँगी कि यह बहुत अच्छी बात है कि इस संस्था की सफलता का जश्न भजन-कीर्तन या ईश्वर भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। इस कार्पाम के मूल में सेवा का भाव है, जन-कल्याण का भाव है, तो मैं बस यही चाहूँगी कि इसकी आकर्षणीयता बनी रहेI

निकुंज कामरा

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