अंक, अपेक्षाएँ और अवसाद का त्रिकोण

तेलंगाना में इंटरमीडिएट परीक्षा के नतीजे घोषित होने के महज तीन दिनों के भीतर 13 छात्रों द्वारा आत्महत्या कर लेना न केवल एक दु:खद घटना है, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, पारिवारिक अपेक्षाओं और सामाजिक दबावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। यह त्रासदी हमें झकझोरती है कि आखिर क्यों हमारे किशोर, जो भविष्य के सपनों से भरे होने चाहिए, इतने असहाय और निराश हो जाते हैं कि जीवन को ही त्याग देने का फैसला ले बैठते हैं।

दरअसल, किशोरावस्था बेहद संवेदनशील और संक्रमणकालीन उम्र होती है। इस उम्र में आत्मसम्मान और पहचान का निर्माण हो रहा होता है। परीक्षा के अंक, जो मूलत मूल्यांकन का एक साधन भर हैं, धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्म-मूल्य का पैमाना बन जाते हैं। जब अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो छात्रों को यह लगता है कि वे असफल ही नहीं, बल्कि अयोग्य भी हैं। यही सोच अवसाद, हीनता और अंततः आत्मघाती प्रवृत्तियों को जन्म देती है।

अत्यधिक प्रतिस्पर्धा ने बढ़ाया छात्रों पर दबाव

यहाँ ठहरकर यह पूछा जा सकता है कि, क्या हमारी परीक्षा प्रणाली अत्यधिक प्रतिस्पर्धात्मक और दंडात्मक हो गई है? आज शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन से अधिक अंकों की होड़ बन गया है। टॉप करने का दबाव इतना अधिक है कि पास होना तो बहुत बार नाकाफी लगता है! स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग की समुचित व्यवस्था का अभाव इस संकट को और गहरा करता है। दुर्भाग्य कि छात्रों को यह सिखाने के बजाय कि असफलता जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा है, हम उन्हें केवल सफलता के संकीर्ण मानकों में बाँध देते हैं!

बेशक, परिवार और समाज की भूमिका भी कम जिम्मेदार नहीं है। माता-पिता अक्सर अपने अधूरे सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बीच तुलना की संस्कृति, किसका बच्चा कितने नंबर लाया जैसे सवाल, बच्चों के मानसिक दबाव को कई गुना बढ़ा देते हैं। सोशल मीडिया ने इस तुलना को और तीव्र बना दिया है, जहाँ हर सफलता सार्वजनिक और हर असफलता निजी शर्म का कारण बन जाती है।

बेहद खराब बात यह कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हमारे समाज में अब भी गहरी चुप्पी और कलंक की भावना व्याप्त है। अवसाद या चिंता को अक्सर कमजोरी मान लिया जाता है, जिसके कारण छात्र अपनी पीड़ा को व्यक्त नहीं कर पाते। वे भीतर ही भीतर टूटते रहते हैं और अंततः कोई कठोर कदम उठा लेते हैं। इस जटिल समस्या के समाधान के लिए बहुस्तरीय प्रयासों की जरूरत है। सबसे पहले, शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाना होगा।

परीक्षा प्रणाली को लचीला और समावेशी बनाने की जरूरत

परीक्षा प्रणाली को अधिक लचीला और समावेशी बनाया जाए। केवल एक परीक्षा के आधार पर भविष्य का निर्णय न हो। निरंतर और समग्र मूल्यांकन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। साथ ही, हर स्कूल और कॉलेज में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक काउंसलर की नियुक्ति अनिवार्य की जानी चाहिए। परिवारों को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें बिना शर्त स्वीकार करना बेहद जरूरी है।

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यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया जाना चाहिए कि अंक जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं। असफलता कोई अपराध नहीं, बल्कि सीखने का अवसर है। सरकार और समाज को मिलकर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। हेल्पलाइन सेवाओं को सुदृढ़ करना, मीडिया में संवेदनशील रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना और स्कूल स्तर पर जीवन कौशलों की शिक्षा देना इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं। तेलंगाना की ये घटनाएँ एक चेतावनी हैं कि यदि हमने अब भी शिक्षा, समाज और मानसिक स्वास्थ्य के इस जटिल संबंध को नहीं समझा, तो हम अपने बच्चों को खोते रहेंगे। समय आ गया है कि हम अंकों की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर बच्चों के जीवन, उनके सपनों और उनकी खुशियों को प्राथमिकता दें।

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