अरसा
दिन के बाद रात और
रात के बाद दिन का चक्र
चलता रहता है निरंतर
पर मेरी रात का सहर हुए
अब एक अरसा हो गया है
आंखों के नीचे के काले घेरे
और उसमें फैली हुई उदासी
मन में छायी हुई निराशा
और कांतिहीन-सा चेहरा
बालों में चमकते चाँदी के तार
और सूखे, पपरीले-से होंठ
कर रहे हैं बयां एक अलग ही किस्से
बस बदल रहे हैं कैलेंडर के पन्ने
पर वक़्त जैसे थम-सा गया है
न तो अब दिन-रात की सुध है
न किसी त्योहार की ख़ुशी
हर उल्लास जैसे ख़त्म हो गया है
न याद रहते हैं सप्ताह के दिन
न ही किसी खास का वर्षगांठ
बस अनवरत एक ढर्रे पर चलते हुए
बीते जा रहे हैं सुबह और शाम
बस नाउम्मीदी में कट रही है ज़िंदगी
और मुस्कुराए हुए एक अरसा हो गया है।

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