चुशुल-मोल्दो वार्ता : बर्फ़ पिघली क्या?
ख़बर है कि भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद में एक सकारात्मक मोड़ आया है। 25 अक्तूबर, 2025 को चुशुल-मोल्दो सीमा पर हुई कोर कमांडर स्तर की 23वीं वार्ता ने दोनों देशों के संबंधों में जमी बर्फ़ के पिघलने के स्पष्ट संकेत दिए हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह बैठक सौहार्दपूर्ण माहौल में चली और दोनों पक्षों ने अक्तूबर 2024 की पिछली बैठक के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति व स्थिरता बनाए रखने पर संतोष जताया।
ग़ौरतलब है कि यह पहली बार था कि पश्चिमी सेक्टर में जनरल लेवल मैकेनिज्म के तहत ऐसी चर्चा हुई। 19 अगस्त, 2025 की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के बाद इस चर्चा के हो पाने से दोनों पक्ष उत्साहित दिखाई दे रहे हैं। दोनों ने मौजूदा तंत्रों से ज़मीनी मुद्दों का समाधान करने पर सहमति जताई। यह बात अलग है कि अभी समाधान दूर हो सकता है। लेकिन समाधान की राह खुली, फिलहाल इसे भी उपलब्धि माना जा रहा है।
सीमा वार्ता में रणनीतिक संतुलन और कूटनीति की जीत
जैसे-जैसे आपसी विश्वास का टूटा तार जुड़ेगा, वैसे-वैसे आपसी समझ भी बढ़ेगी – ऐसी उम्मीद की जा सकती है। मतलब यह कि भले ही यह कोई क्रांतिकारी ब्रेकथ्रू नहीं है, लेकिन निरंतर संवाद की यह कड़ी गलवान घाटी (2020) के खूनी संघर्ष के बाद आई उम्मीद की किरण ज़रूर है। कहना न होगा कि सैन्य दृष्टि से इस प्रकार की वार्ताएँ बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। याद करें कि 2020 के बाद दोनों देशों ने एलएसी पर हजारों सैनिक तैनात किए। बाद में, पांगोंग त्सो और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे क्षेत्रों में डिसएंगेजमेंट हुआ, लेकिन डेपसांग और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाकों में सैनिकों की उपस्थिति अब भी चुनौती है।
इसलिए यह बात अहम हो जाती है कि इस वार्ता में चीन ने सीमा प्रबंधन पर सक्रिय व गहन बातचीत की बात कही है। मानना होगा कि चीन को वार्ता की मेज पर लाने में भारत की मजबूत सैन्य तैयारी – नई सड़कें, ब्रिज और हेलीपैड – ने बड़ी भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप, कोई नया टकराव नहीं हुआ। इस वार्ता की भू-राजनीतिक अहमियत भी कम नहीं है। यह वार्ता ऐसे वक़्त हुई है, जब वैश्विक पटल पर अमेरिका-चीन तनाव अपने चरम पर है।
ट्रेड वॉर और ट्रेड वार्ता दोनों ही नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं। ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर में चीन की आाआक्रामक ढामक गतिविधियों के बीच भारत क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) का मजबूत स्तंभ है। फिर भी, ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर भारत-चीन सहयोग बढ़ा है। विगत तियानजिन बैठक में मोदी-शी चर्चा में सीमा शांति पर जोर दिया गया। ऐसे में, इस वार्ता को अमेरिका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की दूसरी पारी के दौरान उपजी अनिश्चितता के बीच भारत की कूटनीतिक कुशलता का प्रतीक माना जा सकता है।
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आर्थिक संतुलन और कूटनीतिक धैर्य की जरूरत
आर्थिक पहलू की बात करें तो, सयाने बता रहे हैं कि भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार 130 अरब डॉलर को पार कर चुका है। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन असंतुलन (भारत का घाटा 85 अरब!) चिंता का विषय है। सीमा शांति से निवेश बढ़ेगा, सप्लाई चेन मजबूत होगी। भारत का आत्मनिर्भर भारत अभियान चीन पर निर्भरता घटा रहा है, जो मजबूत सौदेबाज़ी का हथियार है।
दरअसल, रिश्तों के सुधरने की धीमी गति का कारण यह है कि चीन की चालाकियों के इतिहास को देखते हुए भारत को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। उत्साह के बीच सतर्कता जरूरी है! विस्तारवादी चीन की सलामी स्लाइसिंग नीति – छोटे-छोटे कदमों से विस्तार – और बफ़र ज़ोन थोपना संदेह पैदा करता है। पूर्ण डिसएंगेजमेंट और पारस्परिक सुरक्षा समझौता अभी दूर है। इसलिए, भारत को सैन्य आधुनिकीकरण जारी रखना होगा।
हाँ, इतना ज़रूर है कि चुशुल-मोल्दो वार्ता ने साबित किया है कि धैर्यपूर्ण कूटनीति काम करती है। भारत को इस गति को बनाए रखते हुए शांति के साथ शक्ति का संतुलन अपनाना चाहिए। आने वाली वार्ताओं से वास्तविक प्रगति हो, इसी में राष्ट्रहित है। जमी बर्फ़ पूरी तरह पिघले, इसके लिए दोनों देशों को नेतृत्वकारी इच्छाशक्ति दिखानी होगी।
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