डाकू : रंग बदलते चेहरे हीरो या विलेन ?

वास्तविक जीवन में यदि डकैत हमारे बीच आ जाएँ, तो हम उनके आतंक से बचने के लिए सौ जतन करने लगें और जब वही रील में आते हैं तो हम उन्हें सर-आंखों पर बिठा लेते हैं। कम से डकैतों पर बनी फिल्मों से तो यही सिद्ध होता है। सौ बात की एक बात यह है कि रहमान डकैत की तारीफ और उस पर हो रही राजनीति ने इस समय बॉलीवुड और राजनैतिक गलियारों में एक खासा माहौल बना रखा है।

इसके साथ ही एक डकैत का जिस तरह से महिमा मंडन किया जा रहा है, वह बताता है कि हम नदी के बहाव के साथ बहने के इतने आदी हो चुके हैं कि इतिहास के उन डकैतों को भूल रहे हैं, जिन्होंने अपने नाम से जनसामान्य की रूह को कंपा दिया था, जिनको डर का दूसरा नाम ही नहीं, ग़रीबों का मसीहा भी कहा जाता था।

जिन फिल्मों ने डकैतों की दुनिया को जनता को हर रूप में दिखाया है, उनमें खास हैं- शोले, मेरा गांव मेरा देश, बैंडिट क्वीन, पान सिंह तोमर, सोन चिड़िया, मुझे जीने दो, डकैत, गंगा जमुना, पुतलीबाई, चंबल की कसम, चायना गेट, बिंदिया और बंदूक, जिस देश में गंगा बहती है, लोहा आदि। कुछ डकैत भी ऐसे हुए हैं, जिनका इतिहास हर किसी को सोचने को मजबूर कर देता है।

चंबल के कुख्यात डकैतों की दहशत

उत्तर प्रदेश में दस्यु सम्राट और दद्दा के नाम से मशहूर छविराम उन डकैतों में थे, जिन्होंने मुख्यमंत्री जैसी शख्सियत को भी हिलाकर रख दिया। यह बात कम ऐतिहासिक नहीं है कि जिस पुलिस अफसर की टीम ने छविराम का एनकाउंटर किया, उसी ने उनके बेटे के कंधे पर स्टार लगाकर उसे समाज की रक्षा करने के लिए पुलिस में शामिल किया।

फूलन देवी की कहानी तो सर्वविदित है कि वह किस तरह से दस्यु सुंदरी बनी और फिर सांसद तथा किस तरह से उसकी हत्या हुई। पुतलीबाई की कहानी जो भी रही हो, पर उसकी कव्वाली- कैसे बेशर्म आशिक हैं, आज के, इनको अपना बनाना गजब हो गया.. लंबे समय तक आशिक एंथम बन गया था। इसका एक अंतरा तो विवाद की जड़ भी बना था, वह था-कलाई देखो तो चूड़ी का बोझ सह न सकें और उस पर दावा कि तलवार हम उठाएंगे।

वैसे फूलन देवी ने पुरुषों का शिकार होकर उन्हें जिस तरह से ललकारा था, वह चंबल के बीहड़ों में अभी भी गूंजता है। डकैतों पर काफी कुछ लिखा जा सकता है पर यहाँ सिर्फ तीन के विषय में जानते हैं। पहले छविराम की कहानी। 80 के दशक में छविराम ने उत्तर प्रदेश पुलिस का जीना मुहाल कर दिया था। अलीगंज के नाथुआपुर में नौ पुलिसकर्मियों की हत्या, सीओ को अगवा करके बता दिया था कि वह कितना सशक्त है।

चंबल के डकैत: खौफ, बदला और फिल्मी हकीकत

तब एक रणनीति के तहत उसका एनकाउंटर कर दिया गया। कहते हैं उस समय कोई नौ हजार राउंड गोलियां चलीं। मैनपुरी के क्रिश्चियन कालेज फील्ड में उन्हें चारपाई से बांधकर जब लाया गया तो जनता का हुजुम उमड़ा पड़ा था। शोले का गब्बर सिंह मध्यप्रदेश के भिंड का रहने वाला था। भूमि विवाद में उसके पिता के साथ हुए अन्याय का बदला तब के गबरा सिंह ने दो हत्याएं करके लिया और जा पहुँचा चंबल के बीहड़ों में।

बस उसके बाद उसने जो धमाल मचाया उसकी गूंज हर कहीं सुनाई दी। बताते हैं कि गबरा सिंह जो बाद में गब्बर सिंह बन गया, उसने अपने एनकाउंटर से बचने के लिए एक तांत्रिक की शरण ली तो उसके कहे अनुसार उसने 116 लोगों की नाक काट दी। यह बात अलग है कि वह बाद में गांव वालों की मुखबिरी से ही एनकाउंटर में मारा गया पर उसने इससे पहले मुखबिरी के शक में 21 बच्चों को भी मार डाला।

शोले का जो डायलॉग है- मुझे गब्बर सिंह चाहिए जिंदा या मुर्दा…माना जाता है तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अधिकारियों से इसी भाषा में उसका सफाया करने को कहा था। मोहर सिंह, माधो सिंह, मलखान सिंह, कुसमा नाइन, लालाराम श्रीराम, जगन गुर्जर ही नहीं सुल्ताना डाकू, मान सिंह, रमेश सिकरवार जैसे डकैतों के कारनामे कम नहीं हैं। लेकिन दस्यु सुंदरी फूलन देवी की कहानी एकदम फिल्मी लगती है।

वह पहले अपने साथ हुए अन्याय का बदला दर्जनभर से अधिक ठाकुरों की हत्या करके लेती है और फिर सांसद बन जाती है। जरा सोचिए, एक डकैत… संसद में और फिर उसकी गोली मारकर हत्या? क्या ऐसा नहीं लगता जैसे बच्चों को कोई कहानी सुनाई जा रही है। पर है यह इसी दुनिया का काला सच। भले ही दूसरे संदर्भों में डकैतों का महिमा मंडन किया जाए पर शायद ही कोई अपने बच्चों को उन जैसा बनने की शिक्षा दे। रील अलग है और रियल जिंदगी अलग, ठीक वैसे ही जैसे इनके सतरंगी रंग।

मनोज प्रकाश

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