जीवन प्रभु को समर्पित करने से होगा कल्याण : हरिप्रियाजी

हैदराबाद, जीवन में समर्पण सबसे महत्वपूर्ण है। जो भक्त प्रभु की शरण में जाता है, उसका कल्याण होता है। प्रभु को समर्पित होने वाले जीव हमेशा निश्चिंत रहते हैं। उक्त उद्गार सिद्दिअम्बर बाजार स्थित बाहेती भवन में राजस्थानी जागृति समिति द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस कथा की महत्ता बताते हुए कथा वाचक बाल विदुषी सुश्री हरिप्रिया वैष्णवीजी ने दिये। उन्होंने कहा कि लाला के आने के साथ ही नंद भवन में आनंद छा गया।

नंद बाबा महामना हो गये। वे सोने, चांदी, वस्त्र व अन्य कई संपदा न्यौछावर करने लगे। लाला के दर्शन के लिए सभी उम्र के लोग आये। गोपियां भी गोपी गीत के प्रथम श्लोक से वंदना करती हैं। गोपी गीत रामलीला के दिन गाया जाता है लेकिन आनंद भवन में पहली बार गोपी गीत के प्रथम श्लोक से गोपियों ने आह्वान किया। लाला जब से ब्रज में अवतरित हुए तो वहाँ इंद्रा यानी लक्ष्मी का वास हो गया। जहां नारायण जाते हैं, वहां लक्ष्मी स्वत आ जाती हैं।

दुष्ट स्वभाव के लोग आते हैं भेष बदल कर

लाला के आने से ब्रज लक्ष्मीमय हो गया। वासुदेवजी महाराज लाला को जब मथुरा से नंद भवन में यशोदा के यहां छोड़ कर वहां से कन्या लेकर मथुरा पहुँचे, तो वह कन्या नहीं बल्कि माया थी। जब कन्या को कंस ने पत्थर पर पटका तो वह आकाश में चली गयी और दुर्गा का रूप धारण कर बताया कि तेरा काल जन्म ले चुका है। कंस ने सारे राक्षसों को ब्रज में नवजात बच्चों को मारने के लिए भेजा। कंस की बहन पूतना ने ब्रज जाकर लाला का वध करने का संकल्प लिया। पूतना जब नंद भवन में सुन्दर स्त्रा का रूप धारण कर पहुँची और पालने में लाला को देखा तो प्रभु ने अपने नेत्र बंद कर दिये।

हरिप्रियाजी ने कहा कि दुष्ट स्वभाव के लोग हमेशा अपना भेष बदल कर आते हैं, वैसे ही पूतना ने भी बदला। उसने लाला को दूर से देखा तो लाला ने कहा कि मौसी आ गई, इसका स्वागत करना है। पूतना ने लाला को स्तन पान करवाने के लिए यशोदा से उन्हें मांगा। नंदरानी यशोदा ने बिना सोचे-समझे पूतना को लाला दे दिया। लाला को गोद में देख प्रसन्न हो गई पूतना स्तन में विष लगाकर आयी थी। लाला ने पूतना को देख आंखें बंद कीं।

प्रभु के नेत्र के बंद करने को लेकर कई संतों ने अपने-अपने मत दिये हैं। एक संत कहते हैं लाला ने इसलिए आंखें बंद की क्योंकि पूतना अज्ञानता का प्रतीक है और कान्हा ज्ञान का अवतार। लाला ने नेत्र इसलिए नहीं मिलाया कि अगर नजर से नजर मिल जाएगी तो प्रेम हो जाएगा और प्रेमी को नष्ट नहीं कर पायेंगे। दूसरे संत कहते हैं कि कन्हा ने इसलिए आंखे बंद कीं, क्योंकि पूतना मां बनकर आई। मां ही अपनी संतान को गोद में लेकर दूध पिलाती है।

जीवन में गुरु, माता और गौ का सम्मान करने का संदेश

हरिप्रियाजी ने आगे कहा कि जीवन में कभी भी गुरु माँ, सगी माँ, गौ माता, ब्रह्माणी और राजा की पत्नी का अहित नहीं करना चाहिए। एक संत का मत है कि लाला ने नेत्र बंद कर महादेव से पहले विष का पान करने का आग्रह किया। महादेव के हृदय में हमेशा श्रीकृष्ण का नाम रहता है। पूतना ने विषयुक्त स्तन लाला के मुख में डाला तो लाला ने दूध का पान करने के साथ-साथ उसके प्राणों को भी खींच लिया। इस प्रकार प्रभु ने पूतना का उद्धार किया। जीव को अपने जीवन को पूर्ण रूप से प्रभु को समर्पित कर देना चाहिए, फिर प्रभु निश्चित ही कल्याण करेंगे।

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अवसर पर श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं की कथा का श्रवण हरिप्रियाजी ने करवाया। आज व्यास पूजा दैनिक यजमान अशोक कुमार हीरावत द्वारा की गयी। कल का प्रसंग श्रीकृष्ण रुक्मिणी मंगल विवाह का रहेगा। भक्तों से कथा में उपस्थित रहने का आग्रह किया गया है। अवसर पर समिति के अध्यक्ष श्रीनिवास सोमानी, अशोक कुमार हीरावत, महेश अग्रवाल, संजय राठी, मनीष सोमानी, द्वारकादास काबरा, कमल भट्टड़, गोविंद राव बिरादर, आशा देवी सोमानी, उर्मिला मोदानी, जय प्रकाश लड्डा, बालाप्रसाद लड्डा, बालाप्रसाद मोदानी उपस्थित थे।

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