आखिर कैसी हो बिहार के मुख्यमंत्री की दृष्टि ताकि विकसित राज्य बने बिहार ?

बिहार की पूर्व सरकार ने आत्मनिर्भर बिहार और सात निश्चय -3 के ज़रिए युवा रोज़गार, महिला स्वरोजगार, औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचा उन्नयन को केंद्र में रखा है। इसलिए अगर आने वाले मुख्यमंत्री भी इसी दिशा में अटल रहें, नीतियों को लगातार मॉनिटर करें और भ्रष्टाचार के ख़िल़ाफ खुली जन निगरानी रखें, तो बिहार पूरे देश के विकसित राज्यों की श्रेणी में ज़रूर शामिल हो सकता है। यह कड़वा सच है कि भावी बिहार के लिए एक सुविचारित समावेशी मॉडल बनाना होगा और औद्योगिक उत्पादों के मामले में महाराष्ट्र, गुजरात, कोलकाता आदि पर निर्भरता समाप्त करनी होगी।
सबसे पहले तो आपको बता दूं कि मैं बिहारी हूँ। अब एनसीआर वाला भी हूँ। मेरे जीवन के अमूल्य 36 वर्ष बिहार में गुजरे हैं। अब भी वहां आना-जाना लगा ही रहता है लेकिन जो टीस सालती है, वह यह कि आखिर बिहार का पुराना वैभव कब और कैसे लौटेगा? मगध और पाटलिपुत्र की पुरानी प्रतिष्ठा कैसे पुनर्स्थापित होगी? ऐसा इसलिए कि भारत शुरू से ही बिहार के हाथ में महफूज रहा है, एकीकृत होकर आगे बढ़ा है। युद्ध के स्थान पर बुद्ध बिहार की अविस्मरणीय शान समझे जाते हैं। तक्षशिला, नालंदा और पामशिला की ज्ञान गौरव गाथा कौन नहीं जानता!
स्वाभाविक है बिहार को वह आदमकद नेतृत्व चाहिए, जो अभी तक के चाणक्य नीतीश कुमार और अमित शाह पैदा नहीं कर सके, लेकिन उम्मीदों पर ही तो दुनिया कायम है। लेट्स इंस्पायर बिहार एक अच्छी मुहिम है क्योंकि नेतृत्व दूरदर्शी है। इसलिए मेरी सोच है कि बिहार को सचमुच विकसित राज्य बनाने के लिए उसका मुख्यमंत्री कुछ खास तौर-तरीके का होना चाहिए – न सिर्फ राजनीतिक रूप से सशक्त, बल्कि नीतिगत दृढ़ता, नैतिक क्लीन इमेज और प्रशासनिक दक्षता वाला नेता होना ज़रूरी है।
पहला, स्पष्ट दृष्टि और समावेशी विकास का रोडमैप रखना
मुख्यमंत्री के पास बिहार के लिए स्पष्ट 10-15 साल का विकास रोडमैप होना चाहिए, जैसे बिहार सरकार के सात निश्चय-3 के ज़रिए 202-2030 तक बिहार को विकसित राज्यों की श्रेणी में ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह के अलावा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अच्छी पहल की, लेकिन यूपीए/एनडीए की चक्की में वे पिसते रहे और बिहार के भविष्य की टीस उन्हें सालती रही। लेकिन नीतीश कुमार की सोच के बिना समृद्ध बिहार संभव नहीं, क्योंकि वे पेशेवर इंजीनियर थे। सोशल इंजीनियरिंग के माहिर भी। लिहाजा, विकास के इस रोडमैप में कृषि, उद्योग, युवाओं को रोज़गार, शिक्षा – स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा (रोड्स, रेल, एयरपोर्ट, लॉजिस्टिक्स) पर संतुलित ज़ोर होना चाहिए।
दूसरा, नीतिगत दृढ़ता और नैतिक स्वच्छता पर जोर
अवकाश प्राप्त शिक्षिका श्रीमती गायत्री कुमारी बताती हैं कि जो मुख्यमंत्री नेपोटिज़्म, जातिगत भाग बंटवारा और भ्रष्टाचार से ऊपर उठकर गुणवत्ता आधारित नियुक्तियाँ करें, वही बिहार को आगे बढ़ा सकता है। उसे निर्णय स्वतंत्र, तकनीकी टीम (आईआईटी, आईआईएम, विशेषज्ञ) के सहयोग से नीतियाँ बनानी चाहिए, न कि सिर्फ राजनीतिक हित के लिए घोषणाएँ करनी चाहिए।
तीसरा, आम जनता के साथ प्रशासन द्वारा सीधा जुड़ाव
बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्य में मुख्यमंत्री को नियमित जनसंवाद, ग्राम सभाएँ, युवा महिला संवाद और अधिकारियों के साथ जन समस्या समाधान जैसे फॉर्मेट चलाने चाहिए। इससे नीतियों की जमीनी हकीकत (ग्राउंड रियलिटी) मिलती रहती है और जनता को भी लगता है कि उनकी आवाज़ वाकई ऊपर तक पहुँच रही है, न कि सिर्फ भाषण और रोड-शो आदि में।
चौथा, सुशिक्षित युवा और सुसंस्कृत महिलाओं पर ज़ोर
बिहार की सबसे बड़ी पूँजी उसकी युवा आबादी है; मुख्यमंत्री को कौशल विकास, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), एमएसएमई , डाइटी, फुड प्रोसेसिंग, फार्मास्यूटिकल और लॉजिस्टिक्स आधारित नौकरियों के लिए विशेष योजनाएँ चलानी चाहिए। महिलाओं को स्वरोजगार, माइक्रो फाइनेंस, एसएचजी लिंकड उद्यम और शहर स्तरीय उद्यमिता केंद्र देने से न केवल रोज़गार बढ़ेगा, बल्कि सामाजिक उत्थान भी होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इन्हें सुशिक्षित और सुसंस्कृत बनाने के लिए सरजमीनी प्रयास होने चाहिए ताकि हिंसक सोच हतोत्साहित हो।
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पांचवां, आधुनिक व व्यवहारिक शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था पर जोर
मुख्यमंत्री को बिहार में गुणवत्तापूर्ण स्कूल, कॉलेज, इंजीनियरिंग, मेडिकल और शोध संस्थानों के नेटवर्क पर अटूट फोकस रखना चाहिए। साथ ही, न्यायपालिका, लॉ एंड ऑर्डर और आपराधिक नेटवर्क के ख़िल़ाफ कड़ी कार्रवाई से निवेशक अनुकूल वातावरण बनाना होगा, जिससे बाहर का पूँजी और उद्योग बिहार में आने को उत्सुक हो। हमें यह पता होना चाहिए कि आधुनिक व व्यवहारिक शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था पर जोर देने से हर सपना साकार किया जा सकता है।
छठा, केंद्र और राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की आवाज़ समय-समय पर उठती रहे
बिहार के मुख्यमंत्री को अलग-अलग राजनीतिक सरकारों के साथ भी राज्य के हित के लिए मजबूत बातचीत करने की क्षमता रखनी चाहिए, ताकि केंद्रीय योजनाओं, बजट और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में बिहार को न्याय मिले। चूंकि देश के पैमाने पर पूर्वी भारत पिछड़ा हुआ है, जिसके उद्धार की जिम्मेदारी बिहार की ज्यादा है। इसलिए पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश और उत्तरपूर्वी सात बहन (सेवन सिस्टर्स) राज्यों के अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार केंद्रित कारोबारी और प्रतिरक्षात्मक रणनीति बनाने के लिए केंद्र सरकार से उचित सामंजस्य बिठाए रखना चाहिए।
सातवां, भावी बिहार के लिए एक सुविचारित समावेशी मॉडल

बिहार की पूर्व सरकार ने आत्मनिर्भर बिहार और सात निश्चय -3 के ज़रिए युवा रोज़गार, महिला स्वरोजगार, औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचा उन्नयन को केंद्र में रखा है। इसलिए अगर आने वाले मुख्यमंत्री भी इसी दिशा में अटल रहें, नीतियों को लगातार मॉनिटर करें और भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जन निगरानी रखें, तो बिहार पूरे देश के विकसित राज्यों की श्रेणी में ज़रूर शामिल हो सकता है। यह कड़वा सच है कि भावी बिहार के लिए एक सुविचारित समावेशी मॉडल बनाना होगा और औद्योगिक उत्पादों के मामले में महाराष्ट्र, गुजरात, कोलकाता आदि पर निर्भरता समाप्त करनी होगी।
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