लोकतंत्र में असहमति : आलोचना बनाम विद्रोह

किसी भी जीवंत और स्वस्थ संसदीय लोकतंत्र में, सत्ता पक्ष की नीतियों और कार्यप्रणाली की आलोचना करना केवल नागरिकों का अधिकार ही नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए जो ऐतिहासिक टिप्पणी की है, वह इसी शाश्वत लोकतांत्रिक मूल्य की पुष्टि करती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार की आलोचना करना अपराध नहीं है तथा विचारधारा के खिलाफ लड़ाई विद्रोह भड़काने से अलग है। कहना न होगा कि यह टिप्पणी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर के बीच एक ठंडी हवा के झोंके जैसी है। गौरतलब है कि इस पूरे विवाद की जड़ राहुल गांधी का यह कथित बयान रहा कि हम अब भाजपा, आरएसएस और भारतीय राज्य (इंडियन स्टेट) के खिलाफ लड़ रहे हैं!

राज्य के खिलाफ बयान को देशद्रोह बताने की दलील

इस बयान को आधार बनाकर एक याचिकाकर्ता ने संभल की अदालत में जनहित याचिका दायर कर एफआईआर दर्ज कराने की माँग की थी। उनका तर्क था कि भारतीय राज्य के खिलाफ लड़ने का आह्वान देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा है, और यह नए आपराधिक कानूनों के तहत राजद्रोह या देशद्रोह की श्रेणी में आता है। निचली अदालतों से झटके के बाद जब मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय दरअसल, न्यायमूर्ति पाम डी. चौहान की पीठ ने अपने फैसले में न्यायशास्त्र और लोकतांत्रिक अधिकारों के जिस संतुलन को उजागर किया है, वह बेहद अहम है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के संदर्भ में लड़ाई शब्द का अर्थ शारीरिक युद्ध या सशस्त्र विद्रोह नहीं होता। राजनीति में इसका तात्पर्य किसी नीति, विचारधारा या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ गहन वकालत और कड़े विरोध से है। इसे अभिधा में लेकर देशद्रोह से जोड़ देना भ्रामक है। यह भी रेखांकित किया गया कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधि जनता और सरकार के बीच सेतु होते हैं।

यदि वे कड़े शब्दों में सत्ता की आलोचना नहीं कर पाएंगे, तो विपक्ष की अवधारणा ही समाप्त हो जाएगी। वैचारिक मतभेद रखना या नीतियों को कठघरे में खड़ा करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। आगे, सयाने ठीक ही कह रहे हैं कि इस फैसले का असर केवल एक राजनेता को मिली कानूनी राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। यह फैसला संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के पक्ष में एक मजबूत ढाल है।

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नीतियों के खिलाफ कड़ा विरोध लोकतंत्र का हिस्सा

यह साफ करता है कि कड़े कानूनों का इस्तेमाल राजनीतिक बयानों के अपराधीकरण के लिए नहीं किया जाना चाहिए। यह भी कि एक मजबूत लोकतंत्र के लिए एक निडर विपक्ष का होना मूलभूत शर्त है। यह फैसला सुनिश्चित करता है कि विपक्षी नेता बिना किसी आपराधिक मुकदमे के डर के, सरकार और उसकी संस्थागत कार्यप्रणाली पर आक्रामक रूप से सवाल उठा सकते हैं।

यहाँ यह कहना भी जरूरी लगता है कि भले ही न्यायालय का यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक मजबूत रक्षक है, लेकिन इस विमर्श में एक महत्वपूर्ण पहलू आलोचना की भाषा और मर्यादा का भी है। एक परिपक्व लोकतंत्र में यह अपेक्षा की जाती है कि शीर्ष राजनेता अपने शब्दों का चयन पूरी जिम्मेदारी और दूरदर्शिता के साथ करें। भले ही लड़ाई या युद्ध जैसे शब्दों का लाक्षणिक अर्थ कानूनी रूप से सशस्त्र विद्रोह न हो, लेकिन सार्वजनिक मंचों से प्रयुक्त भाषा में इतना तो संयम जरूर बरता जाना चाहिए कि वह समाज में किसी भी तरह के हिंसक भड़कावे या अनावश्यक कटुता का कारण न बने!

अंततः, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण रूप से असीमित नहीं है। इसके साथ सदा एक गहरी नैतिक जिम्मेदारी जुड़ी रहती है। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना करना और उन्हें कठघरे में खड़ा करना जरूर है। मगर इस प्रक्रिया में राजनीतिक संवाद का स्तर गरिमापूर्ण बना रहना चाहिए। शब्दों का ऐसा अनावश्यक उपयोग, जो भ्रम पैदा करे या जिसका गलत अर्थ निकाला जा सके, अंततः स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस को नुकसान ही तो पहुंचाता है न!

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