हैदराबादी युवा मोहन वामसी ने दशकों पुरानी वैश्विक जैविक पहेली सुलझायी
हैदराबाद, 25 साल से भी कम उम्र के एक युवा हैदराबादी ने इंसानों में अमीनो एसिड की कमी और प्रोटीन उत्पादन से जुड़ी दशकों पुरानी वैश्विक जैविक पहेली में हल करने में बड़ी सफलता हासिल की है। एआई का इस्तेमाल करते हुए युवा वैज्ञानिक मोहन वामसी नल्लापारेड्डी और उनकी टीम ने एक ऐसा टूल विकसित किया है, जो मॉलिक्यूलर लेवल पर प्रोटीन-उत्पादन की विफलताओं की भविष्यवाणी कर सकता है। ऐसी भविष्यवाणियाँ कैंसर के इलाज और जेनेटिक थेरेपी में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती हैं।
मानव शरीर की हर कोशिका जीवन के लिए ज़रूरी प्रोटीन बनाने के लिए भोजन से प्राप्त अमीनो एसिड का उपयोग करती है। हालांकि कुपोषण, पुरानी बीमारी या तेज़ी से बढ़ते कैंसर में कुछ अमीनो एसिड की कमी हो जाती है। जब ऐसा होता है, तो कोशिका की प्रोटीन-उत्पादन मशीनरी धीमी हो जाती है या पूरी तरह से बंद हो जाती है। गलत या अधूरे प्रोटीन बनते हैं और कुछ मामलों में महत्वपूर्ण प्रोटीन बिल्कुल नहीं बन पाते हैं।
यह मॉलिक्यूलर खराबी इम्यूनिटी को कमजोर करती है, सेलुलर कार्यों को बाधित करती है, और बीमारी और बढ़ा देती है। सालों तक वैज्ञानिक इनके लिए ज़िम्मेदार सटीक जेनेटिक सीक्वेंस का पता लगाने के लिए संघर्ष करते रहे। डीप-लर्निंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल का उपयोग करके वामसी और उनके सहयोगियों ने इस खराबी के पीछे के तंत्र की पहचान की।
वामसी सटीक चिकित्सा और जीन थेरेपी पर शोध जारी रखेंगे
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह मॉडल किसी भी प्रोटीन बनाने वाले जीन से जुड़े जेनेटिक कोड को पढ़ सकता है और यह पहचान सकता है कि कौन से अमीनो एसिड गायब हैं। यह सटीक रूप से भविष्यवाणी भी करता है कि प्रोटीन संश्लेषण कहाँ रुकेगा और इन रुकावटों के लिए ज़िम्मेदार पैटर्न को पहचानता है। यह अब शोधकर्ताओं को एक जीन सीक्वेंस का विश्लेषण करने और शरीर के अंदर होने से पहले संभावित प्रोटीन-उत्पादन विफलताओं का पता लगाने में सक्षम बनाएगा।
यह मॉडल बताता है कि पोषण की कमी बीमारी को कैसे बढ़ाती है और कैंसर बायोलॉजी और मेटाबॉलिक विकारों पर नई रोशनी डालता है। यह अधिक सटीक जीन थेरेपी के विकास में मदद करता है और कृत्रिम प्रोटीन डिजाइन करने में सहायता करता है। बायोफार्मास्युटिकल क्षेत्र में यह तकनीक इंसुलिन, टीके, एंटीबॉडी और अन्य बायोलॉजिक्स के निर्माण में सुधार कर सकती है। इसके अलावा यह मॉडल यह समझाने में मदद करता है कि कुछ जेनेटिक म्यूटेशन केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही बीमारी क्यों पैदा करते हैं।
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वामसी ने कहा कि अब मैं सटीक चिकित्सा और जीन थेरेपी पर ध्यान केंद्रित करूंगा। हैदराबाद में स्कूली शिक्षा और बिट्स पिलानी से कंप्यूटर साइंस में बीई पूरा करने के बाद वामसी यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में शामिल हुए। वह अभी स्विट्जरलैंड में इकोल पॉलिटेक्निक फेडरल डी लॉज़ेन में पियरे वेंडरघेन्स्ट की देखरेख में डॉक्टोरल असिस्टेंट हैं।
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