वृद्धावस्था की विडंबना

वृद्धावस्था के आने से पूर्व ही मनुष्य को अपने बुढ़ापे के विषय में सोचना आरंभ कर देना चाहिए। उसे यह प्रयास करना चाहिए कि वृद्धावस्था में उसके पास सिर पर छत और इतना धन हो कि उसे किसी के आगे हाथ न फैलाने पड़े और न ही किसी से अपमानित होना पड़े।

जिन लोगों को पेंशन मिलती है, उनकी बात अलग है। उनका शेष सारा जीवन आराम से कट जाता है। इस बार का सदा स्मरण रखना चाहिए कि पैसा वही अपना है, जो अपने पास है। किसी को दिया हुआ धन कभी अपना नहीं होता, क्योंकि वह समय आने पर मिल नहीं पाता है। उसके लिए दूसरों की दया पर रहना पड़ता है।

जिनको नौकरी के पश्चात इकट्ठा पैसा नहीं मिलता, उन्हें युवावस्था से ही अपने भविष्य के लिए नियोजित तरीके से धन का संग्रह कर लेना चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि वृद्धावस्था के लिए बचाकर रखे गए धन को अपने जीवनकाल में बच्चों को भी न दें। इसके अतिरिक्त किसी बंधु-बांधव को भी उधार न दें। जो धन दूसरे के हाथ में दे दिया जाता है, वह अपना नहीं रह जाता।

अपने बच्चों को धन-संपत्ति और व्यवसाय उत्तराधिकार में अवश्य सौंपना चाहिए, परंतु अपनी वृद्धावस्था के लिए धन-संपत्ति अवश्य संभालकर रखना चाहिए। अतिमोह में आकर बच्चों की अपना सर्वस्व सौंपकर खाली हाथ नहीं रहना चाहिए। निम्न श्लोक में कवि ने यही समझाते हुए कहा है-

वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्रारू पुंसां विडम्बना।।

अर्थात् वृद्धावस्था में यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की मृत्यु हो जाने से अकेला हो जाए, उसकी धन-संपत्ति भी उसके बंधुजनों के हाथों में चली गई हो तथा अपने दैनिक भोजन की व्यवस्था के लिये भी उसे पराधीन रहना पड़े तो यह तीनों परिस्थितियाँ उसके लिये एक विडंबना के समान हैं। यदि अपने पास धन न हो तो मनुष्य को पराधीनता का मुँह देखना पड़ता है। मनीषी कहते हैं-

पराधीन सपनहुं सुख नाहीं।

अर्थात् पराधीनता में मनुष्य को सुख नहीं मिलता। उसे कदम-कदम पर अपमानित होना पड़ता है। किसी को दिया हुआ ऋण उसे कब वापस मिलेगा, कोई नहीं कह सकता। यह स्थिति मनुष्य के लिए अत्यंत विषम, हताश करने वाली और कष्टदायक होती है।

वृद्धावस्था में मनुष्य का अकेला हो जाना ही अभिशाप है। उसका ध्यान कोई रखे तो उसका सौभाग्य अन्यथा दुर्भाग्य। उस समय धन भी उसके पास न हो और वह खाली हाथ हो जाए तो बहुत दुष्कर हो जाता है। तब उसे खाने के भी लाले पड़ जाते हैं। सदा दूसरों को देने वाले को अपनी दैनंदिन की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए दूसरों का मुँह देखना इन अवस्थाओं में बहुत कष्टकर होता है।

मनुष्य को हर कदम फूँक-फूँककर रखना चाहिए। अपनी वृद्धावस्था के लिए उसे समय रहते तैयारी कर लेनी चाहिए। पति-पत्नी दोनों में से जो भी पीछे बच जाए, उसे पैसे की चिंता तो कम से कम न होने पाए। यदि इस तरह की सावधानियाँ बरती जाएं तो वृद्धावस्था में कठिनाइयाँ कम आती हैं।

चन्द्र प्रभा सूद

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