भारत की घेरेबंदी के लिए आकार लेता इस्लामिक नाटो!
यइस्लामी दुनिया/ओआईसी मंचों पर पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर पर नैरेटिव चलाता रहा है। यदि सऊदी और तुर्किये दो बड़े प्रभाव वाले देश इस मुद्दे पर तालमेल बढ़ाते हैं, तो भारत को डिप्लोमैटिक हेडविंड मिल सकता है। हालांकि आतंकी इकोसिस्टम/फंडिंग जैसा खतरा वास्तविक नहीं है क्योंकि आईएमसीटीसी काउंटर टेरर की भाषा बोलता है इसलिए खुले तौर पर भारत-विरोधी आतंकी समर्थन संभव नहीं। लेकिन यहां भी भारत के लिए खतरा तब होगा जब पाकिस्तान राज्य-नीति और प्रॉक्सी नेटवर्क के बीच धुंध बनाए रखे, जिसमें वह माहिर है और नई धुरी के भीतर भू-राजनीतिक समर्थन हासिल कर सकता है। कुल मिलाकर समग्र निष्कर्ष के रूप में देखें तो यह गठबंधन भले तुरत-फुरत में यानी तत्काल युद्ध का खतरा न हो तो भी मध्यम अवधि का रणनीतिक दबाव तो है ही क्योंकि यह पाकिस्तान की क्षमता, हौसले और अंतरराष्ट्रीय स्पेस बढ़ा सकता है। ऐसे में सवाल है कि भारत को क्या करना चाहिए – सिर्फ बयान नहीं, ठोस रणनीति बनानी होगी।
पिछले कुछ समय से भारतीय रणनीतिक विमर्श में एक शब्द बार-बार दोहराया जा रहा है,यह है इस्लामिक नाटो। यह शब्द सुनने में जितना सीधा लगता है, असल में उतना ही जटिल, बहु-परतदार और भू-राजनीतिक है। कुछ लोग इसे अफवाह या राजनीतिक नारा मानते हैं, तो कुछ इसे भविष्य के बड़े सैन्य गठजोड़ की गंभीर चेतावनी। लेकिन तब से यह शब्द दुनिया का और ज्यादा ध्यान खींच रहा है, जब से सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पिछले साल सितंबर 2025 में साइन हुए एक डिफेंस पैक्ट में तुर्किए भी शामिल होने की कगार पर पहुंच गया है।
यह पैक्ट नाटो की तरह काम करेगा और इसमें किसी एक सदस्य पर हमला पूरे ग्रुप पर हमला माना जाएगा। इसे कई लोग इस्लामिक नाटो या मुस्लिम नाटो कह रहे हैं। ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और जल्द ही डील फाइनल हो सकती है। यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि इसमें सऊदी अरब का खजाना, पाकिस्तान का न्यूक्लियर हथियार और तुर्किए की मजबूत मिलिट्री पावर इस इस्लामिक नाटो में एक साथ आ रही हैं । भारत इस डील पर गहरी नजर रख रहा है। क्योंकि भारत और इजराइल, इन दो देशों के लिए ही यह सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है? ऐसे में सवाल है कि भारत को किस तरह की रणनीति अपनानी चाहिए?
सऊदी-पाक रक्षा पैक्ट और तुर्किये की भूमिका से बढ़ती चिंता
दरअसल पहले इस्लामिक नाटो शब्द अक्सर एक भावनात्मक-राजनीतिक टैग की तरह इस्तेमाल होता था। जबकि जमीनी हकीकत में इसके पीछे दो अलग-अलग धाराएँ दिखाई देती थीं – एक सऊदी नेतृत्व वाला आईएमसीटीसी जिसे 2015 में घोषित किया गया और जिसका मुख्यालय रियाद में है। इसे वास्तव में एक पैन-इस्लामिक आतंकवाद-रोधी गठबंधन बताया जाता रहा है ।
जबकि दूसरा हाल के महीनों में चर्चित सऊदी-पाकिस्तान म्यूचुअल डिफेंस पैक्ट था, जिसमें अब तुर्किये के शामिल होने की संभावनाएँ भी बढ़ गयी हैं। इसी संभावना के बाद यह खतरनाक गठजोड़ बनकर उभरा है और इसलिए मुस्लिम नाटो जैसा कहा जाने लगा है। क्योंकि नाटो की धारा-5 जैसी सोच – एक पर हमला, सब पर हमला, इसका भी ध्येय वाक्य बताया जा रहा है।
कहने का मतलब यह कि भारत के लिए खतरे का आकलन करते समय यह समझना जरूरी है कि आईएमसीटीसी या नया नाटो जैसा इस्लामिक गठजोड़ (नई त्रिपक्षीय धुरी-सऊदी-पाकिस्तान-तुर्किय़े) वास्तविक सैन्य-सामरिक प्रभाव पैदा कर सकता है – खासकर अगर यह केवल बयान नहीं, बल्कि साझा अभ्यास, हथियार, इंटेलिजेंस और कूटनीतिक समन्वय तक पहुँचे। हालांकि आईएमसीटीसी को 2015 में घोषित किया गया था; इसमें दर्जनों मुस्लिम देश शामिल हैं और यह आतंकवाद/उग्रवाद-वित्तपोषण/विचारधारा-विरोध जैसे क्षेत्रों में पहल की बात करता है। लेकिन इसकी स्पष्ट सीमाएं थीं जैसे यह नाटो जैसी बाध्यकारी सामूहिक रक्षा संधि नहीं था या है।
र्किये की एंट्री: तीन ताकतों का मेल और ‘मुस्लिम नाटो’ की आहट
साथ ही इसके कई सदस्य देशों के आपसी मतभेद, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएँ और गुटबंदी इसके एकीकृत सैन्य बल बनने में बाधक थीं। आलोचक इसे कभी-कभी ईरान-विरोधी/शिया-विरोधी झुकाव वाला भी मानते रहे हैं, क्योंकि ईरान, इराक, सीरिया जैसे शिया-प्रभावी देश इसमें शामिल नहीं हैं। निष्कर्ष यह कि आईएमसीटीसी अपने आप में भारत के लिए सीधा सैन्य खतरा नहीं था, यह अलग बात थी कि यह एक मंच है जो भविष्य में कुछ देशों को अधिक समन्वित होने का अवसर दे सकता है – विशेषकर पाकिस्तान जैसे देश के लिए।
जबकि नई सैन्य धुरी जिसमें सऊदी -पाकिस्तान रक्षा संधि और इसमें तुर्किये की भूमिका मिलकर असली और बड़ी चिंता पैदा करती हैं। भारत के लिए वास्तव में अधिक गंभीर संकेत सितंबर 2025 के सऊदी – पाकिस्तान म्यूचुअल डिफेंस समझौते से ही आता है। अल जज़ीरा की रिपोर्ट ने इसके होते ही साफ़ कर दिया था कि इसकी मूल भावना एक पर हमला, दोनों पर हमला जैसी साझा सुरक्षा प्रतिबद्धता भारत के लिए बाया पाकिस्तान खतरा है।
इसके बाद 2026 जनवरी में मीडिया/ विश्लेषणों में यह खबर तेजी से उभरी कि तुर्किये इस ढांचे से जुड़ने की दिशा में बातचीत कर रहा है तभी इसे मुस्लिम नाटो जैसे नाम दिए गए। यह संयोजन खतरनाक इसलिए माना जा रहा है ; क्योंकि विश्लेषणों में इसे तीन पूरक ताकतों का मेल बताया गया है – तुर्किये का सैन्य-उद्योग, ड्रोन/तकनीक, युद्ध-अनुभव, पाकिस्तान की मिसाइल क्षमता साथ में परमाणु क्षमता और सऊदी अरब की वित्तीय शक्ति, प्रभावी अरब नेतृत्व, ऊर्जा-राजनीति आदि मिलकर इसे खतरनाक गठजोड़ बनाते हैं।
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नाटो जैसा नहीं, फिर भी पाकिस्तान को मिलती रणनीतिक गहराई
हालांकि यह नाटो जितना संगठित न है और न हो सकता है फिर भी भारत के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकता है क्योंकि इससे पाकिस्तान को नई रणनीतिक गहराई मिल सकती है – कूटनीति, हथियार-सप्लाई, फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव निर्माण में मुस्लिम देशों का साथ। इसलिए यह भारत के लिए एक नहीं तीन स्तरों पर खतरा बन सकता है- पहला सैन्य खतरा दूसरा तुर्किये की पाकिस्तान को उन्नत सैन्य सहयोग का खतरा।
इससे पाकिस्तान को टेक्नोलॉजी/ड्रोन/इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसी क्षमताओं में गति मिल सकती है। वैसे भारत के खिलाफ सीधी सामूहिक सैन्य कार्रवाई की संभावना कम है, फिर भी सीमा पर सपोर्टिंग रोल (लॉजिस्टिक, हथियार, ट्रेनिंग, आईएसआर सहयोग) खतरनाक बन सकता है। इसके अलावा इसका तीसरा बड़ा खतरा कूटनीतिक/नैरेटिव गढ़े जाने का खतरा है। यह खतरा सबसे वास्तविक है। इस्लामी दुनिया/ओआईसी मंचों पर पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर पर नैरेटिव चलाता रहा है।
यदि सऊदी और तुर्किये दो बड़े प्रभाव वाले देश इस मुद्दे पर तालमेल बढ़ाते हैं, तो भारत को डिप्लोमैटिक हेडविंड मिल सकता है। हालांकि आतंकी इकोसिस्टम/फंडिंग जैसा खतरा वास्तविक नहीं है क्योंकि आईएमसीटीसी काउंटर टेरर की भाषा बोलता है इसलिए खुले तौर पर भारत-विरोधी आतंकी समर्थन संभव नहीं। लेकिन यहां भी भारत के लिए खतरा तब होगा जब पाकिस्तान राज्य-नीति और प्रॉक्सी नेटवर्क के बीच धुंध बनाए रखे, जिसमें वह माहिर है और नई धुरी के भीतर भू-राजनीतिक समर्थन हासिल कर सकता है। कुल मिलाकर समग्र निष्कर्ष के रूप में देखें तो यह गठबंधन भले तुरत-फुरत में यानी तत्काल युद्ध का खतरा न हो तो भी मध्यम अवधि का रणनीतिक दबाव तो है ही क्योंकि यह पाकिस्तान की क्षमता, हौसले और अंतरराष्ट्रीय स्पेस बढ़ा सकता है। ऐसे में सवाल है कि भारत को क्या करना चाहिए – सिर्फ बयान नहीं, ठोस रणनीति बनानी होगी।
यह रणनीति चार स्तरों पर होनी चाहिए-
- सऊदी/यूएई के साथ हार्ड सिक्योरिटी डायलॉग क्योंकि भारत के पास इस संबंध में सबसे बड़ी ताकत आर्थिक साझेदारी, ऊर्जा-निर्भरता, प्रवासी भारतीयों की भूमिका और निवेश है। ऐसे में भारत को चाहिए कि सऊदी के साथ नियमित 2 जमा 2 रक्षा-खुफिया संवाद गहरा करे । साथ ही स्पष्ट करे कि भारत के खिलाफ किसी प्रॉक्सी/आतंकी संरचना के लिए जीरो टॉलरेंस ही साझेदारी की शर्त है ।
- दूसरा स्तर तुर्किये पर टार्गेटेड डिप्लोमेसी होनी चाहिए जिसमें टेक/डिफेंस और कंटेनमेंट की साझेदारी होनी चाहिए । याद रखिये तुर्किये भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता। भारत को ट्रेड, एविएशन, टूरिज्म, डिफेंस-सप्लाई चेन -इन सबमें संतुलित लीवरेज बनाना होगा। तुर्किये की ड्रोन/सेंसर/ईडब्ल्यू तकनीक पाकिस्तान तक पहुंचे तो भारत को काउंटर-ड्रोन नेटवर्क और एयर डिफेंस इंटीग्रेशन तेज करना होगा।
- तीसरे स्तर की रणनीति के तहत इंडो-पैसिफिक प्लेबुक यानी क्वाड के साथ मध्य पूर्व और ईस्ट कनेक्ट की रणनीति अपनानी चाहिए । साथ ही भारत को यह मुद्दा धर्म-आधारित गुट बनाकर नहीं देखना चाहिए बल्कि इंडो-पैसिफिक स्थिरता की भाषा में बात बढानी चाहिए। जिसमें समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा मार्ग, लाल सागर, हिंद महासागर कॉरिडोर प्राथमिकता में हों, इन पर मल्टी-नेशनल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क भारत के पक्ष में रहेगा।
- चौथा स्तर घरेलू सुरक्षा का होना चाहिए। प्रॉक्सी-वार में हमें और सख्त होना होगा। कश्मीर/सीमा पर आईएसआर, ड्रोन-रोधी ढांचा, फेंसिंग – सेंसर और टेरर-फाइनेंस ट्रैकिंग मजबूत होनी चाहिए।

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