समष्टि से व्यष्टि के जुड़ाव का पर्व मकर संक्रांति
मकर संक्रांति हमारा अद्वितीय पर्व है। आदित्य की गति से जुड़ा महापर्व। हमारे पर्व हमारी वर्षचर्या और मनश्चर्या के अंग है। मकर संक्रांति जैसे पर्व हमारा मनस यानी हमारी साइक रचते हैं। स्नान, जप-तप, ध्यान और दान की महत्ता को हम भारतीय चित्त से पृथक नहीं कर सकते। भयजन्य आस्था और फलप्रेरित विश्वास ने ऐसे कर्मकाण्डों की नींव रखी है, जिन्हें हम गतानुगतिक हो निभाते हैं। अलौकिक शक्तियों में आस्था और पारलौकिक जीवन में विश्वास हमारे डीएनए में समाहित-सा प्रतीत होता है। नियति और प्रारब्ध हमारे लिए यूं ही मूल्यवान नहीं हुए हैं। गहन आस्था और अगाध विश्वास की कोशाओं से निर्मित हैं, हमारे मनस के ऊतक। हमारा यही मनस प्रतिवर्ष मकर संक्रांति की आतुर प्रतीक्षा करता है और क्षणभर को ही सही अनिर्वच-आनंद में लीन हो जाता है।
आरंभ आनंद का उत्स है और आनंद उत्सव का पर्याय व प्रसंग। अनादिकाल से हम भारतीय उत्सवप्रिय हैं। उत्सवप्रिया : भारतीया:। उत्सव हमें आनंदित करते हैं और हम जब आनंदित होते हैं, तो उत्सव मनाते हैं। हमारी रुचि शोकांतिकाओं में नहीं, कामुदी में है। जीवन का प्रारंभ। ऋतु का प्रारंभ। वर्ष का प्रारंभ। सब हमारे लिए उत्सव हैं। मकर संक्रांति भी हमारे लिए उत्सव है। यह हमारा प्रिय पर्व है कि इसी दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। पौष मास में सूर्य का मकर राशि में आगमन पर्व का प्रयोजन बन जाता है। ऐन इसी दिन सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है। इसी से इसे उत्तरायणी भी कहते हैं।
पैन-इंडियन नहीं, उपमहाद्वीपीय पर्व की पहचान
उत्तर भारत में जो मकर संक्रांति या उत्तरायण या उत्तरायणी है, तमिलनाडु में वह पोंगल है। कर्नाटक, आंध्र और केरल में वह संक्रांति है, तो असम में बिहू। पश्चिम बंगाल में वह पौष संक्रांति है, तो काश्मीर घाटी में शिशुर पांत। हरियाणा, हिमाचल और पंजाब में इसे माघी कहते हैं, तो उत्तर प्रदेश और बिहार समेत बड़े भूभाग में खिचड़ी। सही अर्थों में यह पैन-इंडियन पर्व है। पैन-इंडियन क्यों, सही मायने में बृहत्तर भारत या भारतीय उपमहाद्वीप का पर्व। इसे नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कम्बोडिया और मलेशिया आदि देशों में भी मनाते हैं।
कहीं वह पौष संक्रांति है, कहीं माघी या खिचड़ी संक्रांति। कहीं वह सोंङगकरन है, तो कहीं पि मा लाओ। कहीं वह थिंङयान है, तो कहीं मोहा संग्रकान या उझवर तिरुनल। समष्टि से व्यष्टि के जुड़ाव का अनूठा पर्व है मकर संक्रांति। इस दिन हम सूर्य को नैवेद्य चढ़ाते हैं। सूर्य हम सौर मण्डलवासियों का पिता है। ऊर्जा का अजस्र स्रोत। लोकमान्यता है कि 14 जनवरी अर्थात मकर संक्रांति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है। पिछली सदी के प्रारंभ तक तत्कालीन पंचांगों के अनुरूप इसे 12 या 13 जनवरी को मनाते थे, किन्तु विषुवतों के अग्रगमन के फलस्वरूप अब इसे 14 या 15 जनवरी को मनाते हैं। इस वर्ष यानी सन् 2018 ईस्वी में इसे 15 जनवरी को मनाया जाएगा।
खरमास का अंत: मांगलिक कार्यों के शुभारंभ का दिन
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का क्या अर्थ है? अपनी धुरी पर अहर्निश घूम रही सिरों पर चपटी पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध इस दिन सूर्य की ओर मुड़ जाता है। तरीके जुदा हो सकते हैं, रवायतें अलहदा, मगर इस दिन हर कहीं सूर्य की आराधना-उपासना होती है। इस नाते आस्था का अमृत-पर्व है मकर संक्रांति । सूर्य का उत्तर दिशा में अयन अर्थात गमन ही उत्तरायण है।
यह खरमास की समाप्ति का दिन है। खरमास मांगलिक कार्यों की वर्जना का मास है। नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन-यज्ञोपवीत, विवाह जैसे मांगलिक कार्यों का क्रम मकर संक्रांति से शुरू हो जाता है। मांगलिक कार्यों का प्रारंभ अपने आपमें आनंद का बायस है। यह उल्लास के लोक में प्रवेश का पुण्य-प्रसंग है। यह आकाश में रंग-बिरंगी पतंगे उड़ाने का दिन है। कामनाओं की पतंगें जब आसमान में परवान चढ़ती हैं, तो हृदय खुशियों से भर उठता है। अगर पेंच लड़ाने का शौक है तो क्या कहने? इस दिन आकाश का सूनापन छंटता है। खगोल से मनुष्य का रोमांस आसमान में रोमांच सरसाता है।
मकर संक्रांति की छटा और उल्लास नदियों के किनारे और संगम स्थलों पर देखते ही बनती है। इस दिन तीर्थ स्थलों में जनमेदिनी उमड़ पड़ती है। नेपाल में थारू समुदाय इसे बड़ी उमंग से मनाता है। भारत की भांति नेपाल में भी स्नान और दान की परंपरा है। डुबकियां पुण्य का पर्याय हैं। रुरुधाम और त्रिवेणी मेला ख्यात हैं। उत्तर प्रदेश में माघ की महत्ता का क्या कहना? प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर प्रतिवर्ष माघ मेला आयोजित होता है। मकर संक्रांति से प्रारंभ होकर यह एक माह चलता है। पुण्यसलिला त्रिपथगा में डुबकी लगाने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। कड़कड़ाती शीत से लोगों की आस्था खंडित नहीं होती और न ही वह मज्जन के उत्साह में अवरोध उत्पन्न कर पाती है।
प्रयाग में मकर संक्रांति: लघु भारत के जीवंत दर्शन
हिन्दु संस्कृति में स्नान-ध्यान का बड़ा माहात्म्य है। माघ मेले का प्रथम स्नान मकर संक्रांति से शुरू होकर शिवरात्रि के अंतिम स्नान तक चलता है। मकर संक्रांति का पर्व प्रयाग में लघु भारत के अभिनव दर्शन का निमित्त बनता है। नदियों के किनारे यत्र-तत्र बड़े-बड़े मेले भरते हैं। गंगा स्नान कर तिल के व्यंजन ब्राह्मणों व पूज्यों को दान में देते हैं और स्वयं भी सेवन करते हैं। इस दिन खिचड़ी दान करने और खिचड़ी खाने की प्रथा है। आस्था की डोर से बंधे कोटि-कोटि जन इस परंपरा की सोल्लास निर्वाह करते हैं। रीत्यानुसार इस दिन नहाने के पानी में भी तिल के कुछ दाने डाल देते हैं।
यही परंपरा बिहार-बंगाल में भी है। पुण्य कमाने के लिए उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कंबल आदि दान किये जाते हैं। बंगाल में गंगासागर में विशाल मेला भरता है। अद्भुत चाक्षुष दृश्य दिखाई देता है। पौराणिक जनश्रुति है कि इसी दिन गंगा (भागीरथी) भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में विलीन हो गयी थी। गंगासागर की अपार महत्ता का पर्याय है सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार।
पर्व एक, परंपरा अनेक का द्योतक है मकर संक्रांति। महाराष्ट्र में सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए इसका विशेष महत्व है। विवाहित स्त्रियां प्रथम संक्रांति पर अन्य सुहागिनों को दान देती हैं। परस्पर तिल-गुड़ बांटा जाता है। तिल गुड़, हल्दी, रोली बांटने की परंपरा इसे अलग अर्थवत्ता देती है और द्युति भी। तिल-गुड़ देते समय उनका तिल गुड़ घ्या, आणी गोड़-गोड़ बोला (तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो) कहना संक्रांति को वाणी की मृदुता और मधुरता के संस्कार की वांछा से जोड़ता है।
चार दिवसीय पोंगल अनुष्ठान और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता
मकर संक्रांति का पर्व तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी यह सोत्साह मनाया जाता है। अनवरत चार दिन मनाये जाते इस पर्व में पहला दिन भोगी पोंगल, दूसरा सूर्य पोंगल, तीसरा मट्टू पोंगल और चौथा व अंतिम दिन कन्या पोंगल होता है। इन चार दिनों के अनुष्ठान भी रोचक हैं और संबंधों की अंतरंगता के पोषक भी। प्रथम दिन कूड़ा-कर्कट इकट्ठा कर जलाते हैं। दूसरे दिन लक्ष्मी की आराधना कर तीसरे दिन पशुधन की पूजा की जाती है।
अंतिम दिन आंगन में स्नान कर मिट्टी की हांडी में पकी खीर का सेवन करते हैं। यह खीर प्रसादम है। इस दिन बेटी-दामाद (जमाई राजा) का खूब स्वागत-सत्कार होता है। रंग-रंगीलो राजस्थान में भी सुहागिनें संक्रांति की बाट जोहती है। नहाना-ध्यान पूजार्चन के साथ ही ब्राह्मणों को मुक्तहस्त दान के साथ सासु-मां को बयना देना यहां भी रीति है। असम में इस पर्व का सौन्दर्य अनिर्वच होता है। वहां बिहू लोकपर्व है। रंगों और उमंगों का गतिज-पर्व।
कोई नहीं जानता कि मकर संक्रांति का पर्व कब शुरू हुआ? भारतीय मेधा इतिहास नहीं, काव्य रचती है। संभव है कि यह पर्व प्राक्-वैदिक काल में अस्तित्व में आया हो। बाद में इसमें मान्यताएं और रूढ़ियां जुड़ती गयीं। मिथकों ने इसे अलग अर्थवत्ता दी। भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु का प्रसंग भी इससे जुड़ा हुआ है। चिर कुमार भीष्म पितामह ने शर-शैय्या पर तभी प्राण त्यागे, जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश कर गया। संक्रांति पर गोलोकवासी होने से मोक्ष प्राप्ति की मान्यता है।
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दान परंपरा से मोक्ष की अवधारणा और भारतीय जीवन-दर्शन
दान की तो भारत में अबाध और अक्षुण्ण परंपरा है। यम-नचिकेता प्रसंग के मूल में दान की कथा है। कर्ण की महत्ता शौर्य के साथ-साथ उसके दान में भी निहित है। सम्राट हर्ष तो मेले में अपना सर्वस्व दान कर देता था। कविवर नरोत्तमदास कह गये हैं : ब्राह्मण को धन केवल भिच्छा (भिक्षा)। हिन्दु कर्मकाण्ड में जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण परस्पर संबद्ध है। ब्राह्मण को दान के बिना कर्मकाण्ड पूरे नहीं होते। धार्मिक मान्यता है कि संक्रांति पर दिये गये दान का प्रतिफल सौ गुना प्राप्त होता है। शुद्ध धृत और कंबल का दान मोक्ष यानी जन्म-मरण से मुक्ति की गारंटी है। संदर्भित श्लोक है :
माघे मासे महादेव: यो दास्यति द्यृतकाम्बलम।
स: भुक्त्वा सकलान भोगान् अंते मोक्षं प्राप्यति।।

मकर संक्रांति के साथ अनेक अलौकिक वा पारलौकिक प्रसंग व मिथक जुड़े हुए हैं, किन्तु इसकी लौकिक महत्ता निर्विवाद है। सूर्य की संक्रमण क्रिया छह-छह मास के अंतराल पर होती है। इस दिन से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। रात्रि अंधकार, भय, जड़ता की प्रतीक हैं, तो दिन प्रकाश, जागृति और गति का पर्याय। दिन का बड़ा होना सकारात्मक लक्षण है। वह तमस से ज्योति की ओर अग्रसर होने का प्रस्थान-दिवस है। अधिक प्रकाश अर्थात प्राणियों में अधिक चेतना। अधिक आलोक। अधिक ऊर्जा। अधिक सृजन। अधिक सौन्दर्य। अधिक संतुष्टि। अधिक तृप्ति। यही वजह है कि मकर संक्रांति का आद्य-पर्व हमें ऊर्जस्वित करता है, गतिज ऊर्जा से माड़ता है और बरबस भावविभोर करता है।
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