कालासागर संघर्ष विराम : राहत भी, संशय भी!

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रूस और यूक्रेन के बीच कालासागर में शत्रुता समाप्त करने और ऊर्जा संस्थानों पर हमले रोकने के लिए, सऊदी अरब में अमेरिका की मध्यस्थता में संपन्न हुई संधि पहली नज़र में तो राहत देती प्रतीत होती है। लेकिन यह भी साफ देखा जा सकता है कि कुछ मूलभूत संशय भी इसके साथ नत्थी हैं।

बताया जा रहा है कि इस संधि के तहत दोनों देशों ने कालासागर में सैन्य कार्रवाई रोकने, सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करने और व्यावसायिक जहाजों का सैन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग न करने पर सहमति व्यक्त की है। इसके अतिरिक्त, दोनों पक्षों ने 30 दिनों के लिए ऊर्जा संस्थानों (तेल रिफाइनरी और परमाणु संयंत्रों) पर हमले रोकने का संकल्प लिया है।

रूस की शर्तें, यूक्रेन की चिंताएँ और निगरानी की चुनौती

लेकिन, रूस कह रहा है कि वह इस समझौते का पालन तभी करेगा जब पश्चिमी देशों द्वारा उसके कृषि निर्यात पर लगाए प्रतिबंध हटेंगे! ख़ासकर वह चाहता है कि उसके कृषि बैंक को फिर से स्विफ्ट भुगतान प्रणाली से जोड़ा जाए। बेशक, यह समझौता शांति के लिए एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन रूस की शर्त को पूरा करना शायद स्वयंभू शांतिदूत डोनल्ड ट्रंप के लिए उतना आसान न हो।

कुछेक सयानों को लगता है कि रूस के कृषि क्षेत्र पर लगे प्रतिबंध हटाने से उसकी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिल सकता है। मानवाधिकार कार्यकर्ता सर बिल ब्राउडर ने चेतावनी दी है कि इस तरह की रियायतें रूस को भविष्य में और आक्रामक होने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं।

दूसरी ओर, यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की इस बात को लेकर आशंकित हैं कि अमेरिका ने रूस के साथ बातचीत की, लेकिन इसमें यूक्रेन की संप्रभुता को लेकर स्पष्टता नहीं रखी गई। उन्हें डर सता रहा है कि इस समझौते से रूस को आगे और शर्तें थोपने का म़ौका मिल सकता है।

इसके अलावा, इस समझौते को लागू करने और निगरानी रखने की कोई ठोस योजना अब तक नहीं बनी है। शुरूआत में, दोनों देश ख़ुद ही इस पर निगरानी रखेंगे। तुर्की और सऊदी अरब जैसे देशों की संभावित भूमिका पर चर्चा हो रही है। लेकिन, यह व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी, इस पर संदेह बना हुआ है।

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वैश्विक प्रभाव और भारत की रणनीतिक चुनौतियाँ

कहना न होगा कि इस समझौते का असर केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कई परिणाम देखने को मिल सकते हैं। याद रहे कि कालासागर अनाज निर्यात का एक प्रमुख मार्ग है। इसलिए यह समझौता रूस को वैश्विक अनाज बाजार से अधिक लाभ प्राप्त करने में मदद करेगा, जिससे वैश्विक खाद्य कीमतों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का प्रभावित होना स्वाभाविक है।

इसी तरह, ऊर्जा संस्थानों पर हमले रोकने का निर्णय यूरोप में ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर कर सकता है, जिससे ऊर्जा की कीमतों में स्थिरता आ सकती है। सयाने यह भी कह रहे हैं कि भले ही अमेरिका की मध्यस्थता से यह स़ाफ है कि वह संघर्ष को समाप्त करने में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। तो भी, अगर इस समझौते को रूस की ओर झुका हुआ माना गया, तो इससे अमेरिका-यूक्रेन संबंधों में तनाव पैदा हो सकता है!

अंततः इस समूचे घटपाम को भारत के नज़रिये से भी देखने की ज़रूरत है। भारत की रूस और पश्चिमी देशों दोनों के साथ रणनीतिक साझेदारी है। उसके लिए यह स्थिति संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत को दर्शाती है। कालासागर क्षेत्र में स्थिरता भारत के लिए सकारात्मक होगी, क्योंकि यह भारत के ऊर्जा आयात की निरंतरता सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है।

यही नहीं, भारत एक प्रमुख अनाज आयातक है और वैश्विक अनाज बाजार में किसी भी उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत की खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है। अत भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए संतुलित रुख अपनाना होगा और शांति प्रयासों का समर्थन करना होगा।

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