दामोदर भगवान की पूजा का माह है कार्तिक
धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास भगवान श्रीहरि विष्णु को विशेष रूप से प्रिय है। इसी मास में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाल-लीलाओं से भक्तों को भक्ति-भाव और समर्पण का संदेश दिया है। कार्तिक मास को दामोदर मास भी कहा जाता है। दामोदर शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है- दाम अर्थात रस्सी और उदर अर्थात पेट, जिसका अर्थ है- वह भगवान जिनके उदर पर रस्सी बंधी है।
दामोदर लीला
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन मिलता है। भगवान कृष्ण बचपन में नटखट और लीलामय थे। भगवान कृष्ण नंदगांव में छोटे बालक के रूप में लीला कर रहे थे। एक दिन माता यशोदा उन्हें मक्खन चुराकर खाते हुए पकड़ लिया। माता यशोदा ने उन्हें माक्खन की चोरी करते हुए देखा, तो हाथ में छड़ी लेकर उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ने लगीं।
श्रीकृष्ण भयवश भागने लगे, लेकिन अंतत मातफ-स्नेह ने उन्हें जकड़ लिया। माता यशोदा ने जब उन्हें दंड देने का विचार किया, तो श्रीकृष्ण रोने लगे और नन्हीं गोल व बड़ी-बड़ी काली आंखों से अश्रु बहाने लगे। यशोदा उन्हें अनुशासन सिखाने के लिए एक ओखली से रस्सी द्वारा बांधने लगीं। किंतु आश्चर्य की बात यह रही कि रस्सी हर बार दो अंगुल छोटी पड़ जाती थी।
यशोदा बार-बार रस्सी जोड़ती रहीं। अंतत जब उनके हृदय में नारायण का स्मरण आया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी माया समेट ली और रस्सी उनके पेट से बंध गई। इसी घटना से उनका नाम दामोदर पड़ा। दामोदर लीला केवल बाल-ाढाड़ा नहीं है। इसके पीछे गहन आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
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भगवान स्वयं को उस भक्ति के आगे समर्पित कर देते हैं जो निर्मल, निस्वार्थ और प्रेममयी होती है। माता यशोदा का प्रेम ऐसा था, जिसमें न भय था, न लोभ, केवल वात्सल्य था। इस लीला से यह स्पष्ट होता है कि भक्त जब सच्चे भाव से भगवान को पुकारता है, तो वे अपने दिव्य स्वरूप को भी सीमित कर लेते हैं।
दामोदर पूजा का महत्व
कार्तिक मास में दामोदर भगवान की विशेष पूजा करने की परंपरा है। इस मास में दीपदान, तुलसी पूजा और श्री दामोदराष्टक का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। कहा गया है कि जो व्यक्ति इस मास में श्रीकृष्ण की दामोदर रूप की आराधना करता है, उसे सभी पापों से मुक्ति प्राप्ति होती है।
इसी कारण यह मास भक्ति-भाव, संयम और प्रकाश का प्रतीक बन गया है। इस प्रकार कार्तिक मास केवल पुण्य का महीना नहीं, बल्कि वह समय है, जब भगवान स्वयं अपने भक्त के प्रेम के बंधन में बंधे और संसार को यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति से ईश्वर भी बंध जाते हैं।
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