तप करते समय मन में रखें क्षमा का भाव : सुमंगलप्रभाजी
हैदराबाद, तप से व्यक्ति का शरीर दुर्बल होता है, पर मन बड़ा सबल होता है। मन में क्षमा भाव रहता है, कषाय नहीं आते। जो कषाय का क्षमण करता है, उसका तप श्रेष्ठ कहलाता है। उक्त उद्गार सिकंदराबाद मारुति विधि जैन स्थानक में श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ सिकंदराबाद द्वारा आयोजित चातुर्मासिक धर्म सभा को संबोधित करते हुए साध्वी डॉ. सुमंगलप्रभाजी म.सा. ने व्यक्त किये। पूज्यश्री ने कहा कि कर्म के संबंध में व्यक्ति दूसरों को दुःखी बनाकर सुखी बनना चाहता है, पर वह ऐसे कब तक लाभ ले सकता है। आज व्यक्ति दुःखी इसलिए है, क्योंकि उसका पड़ोसी सुखी है।
ऐसे व्यक्ति के दुःख को कोई दूर नहीं कर सकता। जीवन में वही व्यक्ति सुखी रह सकता है, जो पड़ोसी के सुख में सुखी हो। म.सा. ने कहा कि अंतराय के पाँच कर्मों में तीसरा है भोगांतराय। इसके बंधन का मुख्य कारण है स्वार्थ, आसक्ति, ममत्व का भाव। दूसरों के भोग-सुखों के प्रति व्यक्ति ईर्ष्या द्वेष कर जीवन में बाधाएँ उत्पन्न करता है। व्यक्ति के पास भोग के सारे उपकरण एवं सामग्री होने के बाद भी सुखों को भोग नहीं सकता। साधन तो बहुत उपलब्ध कर लिया, धन संग्रह कर इतना हो गया न तो वह स्वयं ही भोग नहीं सकता और न दूसरों को भी भोगने देता है। भोगांतराय बंधन तब होता है, जब हम ध्यान नहीं रखते और विवेक से काम नहीं लेते।
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उपभोग अंतराय और वीर्यांतराय कर्म बंधन
म.सा. ने कहा कि चौथा भेद उपभोग अंतराय कर्म है। ऐसे पदार्थ जिनको बार-बार भोगा जाता है, उपभोग में दूसरे जीवों को अंतराय नहीं देनी चाहिए। यह कर्म अहंकार वश बंध जाता है। किसी के प्रति द्वेष की भावना पैदा होती है, तो उसके बीच विवाद पैदा किया जाता है। पति-पत्नी के बीच प्रेम में विवाद करना, गुरु शिष्य के बीच अच्छा प्रेम है, तो उसको तोड़ना और दरार पैदा करना, उपभोग अंतराय कर्म है।
म.सा. ने कहा कि जो कर्म बंधन ह। उसे अगले भव में भोगना पड़ता है। वस्तु की कीमत नहीं भावों को देखें। अंतराय कर्म का पाँचवाँ है वीर्यांतराय कर्म बंध। यह अहंकार आसक्ति घृणा भाव से वीर्य यानी तन, मन, विवेक, शक्ति के अभाव के कारण होता है। व्यक्ति के पास शक्ति होने के बाद भी परोपकार नहीं कर पाता। धार्मिक क्रियाओं से नहीं जुड़ता। शक्ति होने के बाद भी माता-पिता की सेवा नहीं करता, दूसरे के जीवन में क्लेश करता है, धर्म साधना में विक्षेप करता है, तो वह वीर्यांतराय का बंधन करता है।
वीर्यांतराय कर्म व जीव दया दिवस कार्यक्रम
ऐसे व्यक्ति की अपनी काया के प्रति आसक्ति रहती है, मन में तनाव उदासी रहती है, निराशा भय उद्वेग है। ऐसे भाव जीवन के भीतर पनपते रहते हैं। सभा का संचालन करते हुए अभिषेक अलिजार ने बताया कि जाप की प्रभावना श्री अरिहंत नवयुवक मंडल की ओर से प्रदान की गई। अध्यक्ष गौतमचंद गुगलिया ने बताया कि बाल संस्कार शिविर जारी है, जिसमें लगभग 70 बच्चों ने भाग लिया। संघ की ओर से अल्पाहार की व्यवस्था की गयी एवं प्रभावना दी गई।
महामंत्री सुरेन्द्र कटारिया ने बताया कि शनिवार, 27 सितंबर से वंदना का मासखमन मनाया जाएगा, जिसमें भाग लेने वालों को प्रतिदिन स्थानक आकर विधिवत पंचांग नम करना है। आज श्री अंबेश गुरु मेवाड़ संघ और महिला मंडल द्वारा गुरु सौभाग्य पंचम स्मरण के तीन दिवसीय कार्यक्रम के अंतर्गत आज जीव दया दिवस मनाया गया। अंबेश गुरु मेवाड़ संघ और महिला मंडल द्वारा सौभाग्यमुनिजी म.सा. के 5वें स्मृति दिवस पर जीव दया के अंतर्गत गौशाला में 1000 रोटी, 50 किलो ककड़ी, 100 किलो घास, 50 किलो कबूतर को दाना डाला गया।
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