ज़िंदगी तो नइँ होती

साँसाँ(1) आरइ-जारइ तो, ज़िदगी तो नइँ होती।
अँख्याँ(2) मूचको बैटगै तो, बंदगी(3) तो नइँ होती।।

करम कैसे कररै तुम, इस्का बी(4) ख़्याल रखो,
ज़िदगी के रस्ते पो(5), सीदी अपनी चाल रखो।
फ़र्ज़ अदा करे बोल्को(6), दिल कू समजालेओ पन(7),
चिराग, मज़्ज़िद, मंदिर पो, कित्ते बी जलालेओ।
दिल के इन हिदारों(8) में, रौशनी तो नइँ होती,
अँख्याँ मूचको बैटगै तो, बंदगी तो नइँ होती।।

अंदर से मौकापरस्त(9), बहेर से भोला है,
गिरगुट के सरकाइच(10), इस्का बी चोला है।
सोंच बी नशीली है, ज़हन(11) बी रंगीला है,
लम्बी दाड़ी हौर(12) तिलक, ये तो एक हीला(13) है।
ऐसे चालबाजौं में, सादगी तो नइँ होती,
अँख्याँ मूचको बैटगै तो, बंदगी तो नइँ होती।।

बग्ले भगत सरकीइच(14) तुमारी इबादत(15) है,
पन झपट्टा मारने की पुरानी ये आदत है।
स़ुफेद है तुम उप्पर से, अंदर से काली है,
भलाई के कामाँ सोब, एक नंबर के जाली है।
तुमारे गुनाहों में, कुछ कमी तो नइँ होती,
अँख्याँ मूचको बैटगै तो, बंदगी तो नइँ होती।।

जंता कू जमा करको, बाताँ बड़ी-बड़ी कर्रैं,
मदद की तो बात छोड़ो, पैले अपना घर भर्रैं।
दोगला(16) चेहरा हटको गया, दिख गयी असली सूरत,
ख़ाबाँ बड़े दिखलाको, लूटने का या मकसद(17)
पोल ख़ुल्को गै पिच्छे(18), ख़ुशी बी तो नइँ होती,
अँख्याँ मूचको बैटगै तो, बंदगी तो नइँ होती।।

आज की थोड़ी औलादाँ, कित्ती की ख़ुदगरजी है,
अम्मा-बाप की नइँ सुन्ते, सोब अपनी मरज़ी है।
कित्ते बेरहमी इन, कित्ते कमीने निकले,
जिनकी ख़िदमत करना था, उनकू घर से धकले।
इस्से बड़ी हौर कोई बेबसी(19) तो नइँ होती,
अँख्याँ मूचको बैटगै तो, बंदगी तो नइँ होती।।

-नरेंद्र राय

1.साँसें, 2.आँखें, 3.ध्यान, 4.भी, 5.पर, 6.कहकर, 7.पर, 8.अन्धेरा, 9.अवसरवादी, 10.जैसा ही, 11.दिमाग़, 12.और, 13.बहाना, 14.समान ही, 15. प्रार्थना, पूजा, 16.झूठा, 17.इरादा, 18.बाद में, 19.लाचारी।

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