अनुमति के नाम पर कर्मचारी को पूर्ण संरक्षण नहीं : हाईकोर्ट

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी अनुमति के नाम पर किसी कर्मचारी को पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है, जब तक कि दर्ज मामला आधिकारिक कर्त्तव्यों से संबंधित न हो। यदि दर्ज मामले में लगाए गए आरोप आधिकारिक कर्त्तव्यों से संबंधित नहीं है, तो अभियोजन के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस एन. तुकारामजी आज दक्षिण मध्य रेलवे के वरिष्ठ मंडल प्रबंधक (पश्चिम) वी. गोपाल रेड्डी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना दर्ज किए गए मामलों को रद्द करने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि सीबीआई ने 10 हजार रुपये की रिश्वत लेने और आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में मामला दर्ज किया था और निचली अदालत ने याचिकाकर्ता को दोषी पाया था।

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हाईकोर्ट से बरी, मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित

बाद में उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष घोषित कर दिया और ईडी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की, जो अभी तक लम्बित है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता जो एक सरकारी कर्मचारी के रूप में कार्यरत है, उनके खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले सरकारी अनुमति नहीं ली गई थी। उन्होंने कहा कि सरकारी अनुमति अनिवार्य है। इस आधार पर उन्होंने बिना अनुमति के दर्ज किए गए मामले को रद्द करने की माँग की।

ईडी के अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि रिश्वत लेने के अलावा उनकी आमदानी से कहीं अधिक उनके पास तीन करोड़ रुपये की संपत्ति है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता की पत्नी जो सह-आरोपी है, ने भी ऐसी ही याचिका दायर की थी और उसे उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा कि ईडी द्वारा दर्ज किए गए आरोपों का याचिकाकर्ता के आधिकारिक कर्तव्यों से कोई संबंध नहीं है। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद न्यायाधीश ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत आरोपियों को पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है, जो आरोपों और कर्तव्यों के बीच की अवधि में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। उन्होंने याचिका खारिज करते हुए फैसला सुनाया।

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