झूठा मुकदमा दायर करना अधिकारों का उल्लंघन : कोर्ट
हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एक कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए झूठे मामले को रद्द कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने 31 जनवरी, 2009 को सेवानिवृत्त हुए एक कर्मचारी के खिलाफ उसी वर्ष मार्च माह में निर्मित दवाओं की गुणवत्ता को लेकर दर्ज मामले को रद्द कर दिया। न्यायालय ने सवाल उठाया कि सीबीआई सेवानिवृत्ति के बाद निर्मित दवाओं की गुणवत्ता खराब होने का आरोप लगाते हुए मामले कैसे दर्ज कर सकती है।
न्यायालय ने केंद्र को सेवानिवृत्त कर्मचारी याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपये का भुगतान करने के भी आदेश दिए। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस जूकंटी अनिल कुमार ने हाल ही में इस संबंध में फैसला सुनाया। मई-2010 के दौरान सीबीआई ने सिकंदराबाद के लालागुड़ा स्थित रेलवे सेंट्रल अस्पताल से रोक्सीथ्रोमाइसीन टैबलेट के नमूने एकत्र किए थे। केंद्रीय औषधि नियंत्रण बोर्ड ने परीक्षण में पाया कि ये टैबलेट मानकों के अनुरूप नहीं थे। इसके बाद मामला दर्ज किया गया। इस मामले में हिन्दुस्तान एंटी बायोटिक्स लिमिटेड के जोनल मैनेजर ए.के. गुप्ता को मुख्य आरोपी बनाया गया।
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नमूना संग्रह के समय दूसरे अधिकारी थे जिम्मेदार
गुप्ता ने याचिका दायर कर कहा कि दवा के नमूने एकत्र किए जाने के समय वे सेवानिवृत्त हो चुके थे और नामपल्ली अदालत में उनके खिलाफ आपराधिक मामला खारिज कर दिया जाना चाहिए था। न्यायाधीश ने पाया कि दवा के नमूने एकत्र किए जाने के समय राजेन्दर प्रभारी मंडल प्रबंधक थे। यह भी पाया गया कि प्रीत इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड ने हिन्दुस्तान एंटी बायोटिक्स की ओर से दवा का निर्माण और आपूर्ति की थी। यह माना गया कि याचिकाकर्ता की दवाइयों के निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी और न ही वे दवाई की आपूर्ति के समय या सीबीआई द्वारा दवा के नमूने एकत्रित किए जाने के समय ड्यूटी पर थे। इसीलिए उनके खिलाफ मामला अमान्य था।
फैसले में कहा गया कि याचिकाकर्ता को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद निर्मित घटिया दवाइयों की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार ठहराना अनुचित है। यह सलाह दी गई है कि अधिकारियों या जाँच एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति या कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले कानूनी प्रावधानों की गहन जाँच करनी चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति मामला दर्ज करने से पहले उचित सावधानी नहीं बरतता है, तो उसे अपनी नौकरी खोने का खतरा है।
अदालत ने चेताया कि इससे व्यक्ति का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा और उसके स्वतंत्रता का अधिकार प्रभावित होगा और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत उसे प्राप्त अधिकार भी बुरी तरह से प्रभावित होंगे। याचिकाकर्ता के खिलाफ मामला खारिज करने के अलावा न्यायाधीश ने अपने फैसले में गुप्ता को 50 हजार रुपये मुआवजे के रूप में देने के केंद्र सरकार को आदेश दिए।
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