हे कृष्ण !
हे कृष्ण! आप गैयाओं से अटूट प्रेम किया करते थे,
अत्यंत खुशी-खुशी उन्हें चराने भी ले जाया करते थे।
उनके दूध, दही, माखन आदि का सेवन भी किया करते थे,
उपभोग से अपना मस्तिष्क और शरीर स्वस्थ रखा करते थे।
आपके काल में पयस्विनियां पूर्णरूपेण सुरक्षित रहा करती थीं,
गौ-हत्यायें जैसी घिनौनी हरकतें भूले से भी नहीं हुआ करती थीं,
परंतु, आज गायों के जीवन पर खतरे के बादल मंडराते रहते,
उनके वध के जघन्य पापकर्म खुलेआम ही पापी करते रहते।
केवल पराये धर्मावलंबी ही नहीं गुनहगार,
चंद सनातनी भी गौ-वध के हैं भागीदार।
यानी कुछ बेशर्म एक तरफ तो गायों को गौमाता कहते,
दूसरी तरफ गोमांस खाने में अपनी बेहद शान समझते।
इतना ही नहीं, आपका पूजन-अर्चन भी वे करते रहते,
फिर भी गौ-हनन का विरोध न जाने काहे नहीं करते?
यह तो सरासर ढकोसलेबाजी ही हुई,
थोखाधड़ी करनेवाली हरकत ही हुई।
यूँ समझ लीजिये, आपकी अनुपस्थिति में धेनुओं के संग अन्याय हुआ जा रहा,
वोट बैंक के लोभ के चलते गौ-हत्या के विरुद्ध सख्त कानून नहीं बन पा रहा।
अत करबद्ध प्रार्थना है प्रभु गोविंन्द, आप ही दिखाइये चमत्कार,
गौ-हत्या के दोषियों के मन-मस्तिष्क में भर दीजिये ऐसे सुविचार-
किसी भी हाल में गोमांस को न बना पाये कदापि अपना आहार,
संसार के किसी भी राष्ट्र में न हो पाये कभी भी गैयाओं के स?हार,
तहे दिल से करने लग जायें दुनिया के हर मानव गऊओं से प्यार,
सुरभियों की सुरक्षा, सम्मान का सपना अविलंब हो जाये साकार।

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