चौंतीस लाख प्रार्थियों में से केवल 139 को न्याय

ज़मीनी रिपोर्ट से मालूम होता है कि मोथाबरी के अनेक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में वयस्क पुरुष अपने घरों से फरार हैं। हालांकि इस संदर्भ में कोई आधिकारिक संख्या नहीं हैं, लेकिन वीरान चौराहे, बंद दुकानें और भयावह ख़ामोशी अपनी दास्तान खुद बयान कर रही है। इन लोगों के मतदान न करने से किस पार्टी को फायदा होगा और किस पार्टी को नुकसान, यह तो मुद्दा ही नहीं है, सवाल यह है कि मतदाता सूची से किसी का नाम हटाकर या भय के कारण किसी का मतदान न कर पाना, लोकतंत्र को मज़बूत करेगा या कमज़ोर? इस प्रश्न पर गहन मंथन की आवश्यकता है।
भारत के संविधान की मूल पांडुलिपि पर चित्रण नंदलाल बोस ने किया था। उनके 88-वर्षीय पोते सुप्रबुद्धा सेन का नाम एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था। साथ ही सेन की 82-वर्षीय पत्नी दीपा सेन व केयरटेकर पाधर नायक का नाम भी मतदाता सूची से काट दिया गया था। यह तीनों उन 34 लाख लोगों में शामिल थे, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश द्वारा पश्चिम बंगाल में स्थापित ट्रिब्यूनलों में अर्जी लगायी थी कि वह भारत के वैध मतदाता हैं, उनका मतदाता सूची से नाम हटाया जाना गलत है।
इसलिए उनका नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़ा जाये। गौरतलब है कि एसआईआर में पश्चिम बंगाल के 7.6 करोड़ मतदाताओं को घटाकर 6.82 करोड़ कर दिया गया है। लेकिन ट्रिब्यूनलों ने 34 लाख अर्ज़ियों में से मात्र 139 वोटर्स को ही क्लियर किया है, जिनमें सेन, उनकी पत्नी व केयरटेकर भी शामिल हैं। क्लीयरेंस के बावजूद सेन अपनी बीमारी की वजह से 23 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के दौरान विश्व भारती स्टाफ क्लब, शांति निकेतन में मतदान न कर सके।
510 अपीलें गलत फॉर्म भरने के कारण खारिज
ट्रिब्यूनलों ने 510 अपीलों को इस आधार पर ठुकराया कि अर्जियां गलत तरीके से भरी गई थीं और प्रार्थियों को मतदाता बनने के लिए फॉर्म 6 भरना होगा। बहरहाल, 34 लाख अपीलों में से ट्रिब्यूनलों ने अभी तक सिर्फ 147 पर ही अपना निर्णय सुनाया है, जिनमें से 139 को मतदान करने का अधिकार दिया गया है, जबकि शेष 8 को डिलीट कर दिया गया है और वह पुनःमतदाता बनने के लिए फॉर्म 6 भी नहीं भर सकते, उन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट की शरण लेनी होगी।
यह लोकतंत्र का मजाक नहीं तो और क्या है कि 34 लाख अर्ज़ियों में से सिर्फ 147 पर फैसला लिया जाता है और वह भी मतदान से केवल एक दिन पहले? यह तो लोकतंत्र को ही बर्बाद करने की साज़िश प्रतीत होती है। एक तो बहुत कम समय देकर जल्दबाज़ी में एसआईआर करायी गयी, जिससे अपर्याप्त ट्रेनिंग प्राप्त बीएलओ पर ज़बरदस्त मानसिक व शारीरिक दबाव पड़ा कि अनेक हृदय रोगी हो गये और कई ने आत्महत्या तक कर ली। इस लचर व्यवस्था के कारण स्तरीय एसआईआर का होना संभव ही नहीं था और मनमाने ढंग से लाखों वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गायब कर दिये गये।
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कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
नतीजतन विरोध-प्रदर्शन भी हुए और अदालतों को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। शिकायतों को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल स्थापित करने का आदेश दिया, लेकिन उसका भी नतीजा आपके सामने है। अतः यह आश्चर्य नहीं है कि 22 अप्रैल 2026 को क़ानूनी चुनौतियां तीव्र हो गईं। कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई कि 19 ट्रिब्यूनलों के कामकाज में हस्तक्षेप किया जाये और यह सार्वजनिक किया जाये कि उनकी मानक कार्य प्रक्रिया क्या है?
जिसे हाईकोर्ट के तीन न्यायाधीशों के पैनल ने तैयार किया था। लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल के नेतृत्व वाली खंडपीठ ने यह कहते हुए जनहित याचिका सुनने से इंकार कर दिया कि ट्रिब्यूनलों की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर की गई थी, इसलिए याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में ही दस्तक देनी चाहिए। बहरहाल, 22 अप्रैल 2026 को जो डाटा जारी हुआ है, उससे मालूम होता है कि एसआईआर के तहत मतदाता सूचियों से नाम हटाये जाने का मुद्दा कितना गंभीर है।
मसलन, न्यायिक समीक्षा के बाद मुर्शिदाबाद में 74,775 मतदाताओं के नाम हटाये गये और एसआईआर के विभिन्न चरणों में यह संख्या 91,712 थी। लेकिन ट्रिब्यूनल ने इनमें से सिर्फ एक प्रार्थी, धुलयान नगरपालिका के अध्यक्ष मुहम्मद इन्ज़मुल इस्लाम के मतदान अधिकार को पुनस्थापित किया है। यह लोकतंत्र के साथ मज़ाक नहीं है तो और क्या है? भारत के लोकतंत्र की मज़बूती का आधार ही यही है कि प्रत्येक 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के वैध नागरिक को मतदान का अधिकार है। लेकिन वैध नागरिकों को ही उनके मतदान अधिकार से वंचित किया जा रहा है। इस तथ्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
गरीब नागरिकों के लिए कानूनी लड़ाई बनी चुनौती
अगर इस चलन पर तुरंत प्रभाव से विराम न लगाया गया तो भारत में लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जायेगा। एक नागरिक का मतदाता सूची से नाम मनमाने ढंग से हटा दिया जाता है और फिर उससे उम्मीद की जाती है कि वह अदालतों के चक्कर लगाये फिर से मतदाता बनने के लिए। इस क़ानूनी लड़ाई के लिए कितने नागरिकों के पास पैसा व समय होता है? गरीब देश में यह अन्याय नहीं तो और क्या है? समस्या सिर्फ यही नहीं है।
पश्चिम बंगाल के मोथाबरी में कुछ लोगों ने लगभग एक माह पहले सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया था कि उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये हैं। उनके नाम तो मतदाता सूची में जोड़ दिये गये, लेकिन अब वह शायद मतदान ही न कर पायें; क्योंकि प्रदर्शन की जांच कर रही एनआईए का उनके भीतर इतना अधिक डर बैठा हुआ है कि वह अपने चुनाव क्षेत्र से ही फरार हैं।
गौरतलब है कि 1 अप्रैल 2026 की शाम को लगभग 4 बजे प्रदर्शनकारी पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िले में कालियाचक 2 ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिस के बाहर एकत्र होने लगे। वे गुस्से में थे; क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये थे। प्रदर्शनकारियों ने पहले यह मांग की कि दफ्तर के अंदर जो न्यायिक अधिकारी मौजूद हैं, उनसे उनकी मुल़ाकात करायी जाये।
नेशनल हाईवे 12 जाम, प्रशासन पर बढ़ा दबाव
जब उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गई तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। भीड़ ने बिल्डिंग का घेराव कर लिया और सात न्यायिक अधिकारी उसके अंदर ट्रैप हो गये, जिनमें तीन महिलाएं भी थीं। समय गुज़रने के साथ प्रदर्शन तीव्र होता गया। प्रदर्शनकारियों ने नेशनल हाईवे 12 (कोलकाता-सिलीगुड़ी मार्ग) को भी ब्लॉक कर दिया, जिससे ट्रैफिक बाधित हुआ और प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बढ़ता गया।
देर रात को स्थिति नियंत्रण में तो आ गई थी, लेकिन इस पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी को ध्यान में रखते हुए जांच एनआईए को सौंपी गई। एनआईए की जांच जैसे ही तेज़ हुई तो प्रदर्शनकारियों में अपनी गिरफ्तारी का भय व्याप्त होने लगा। वे अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर होने लगे। सिंगापारा की एक अधेड़ महिला के अनुसार, हमने अपने मर्दों से कहा कि वह यहां न रुकें। हमें मालूम है कि वह निर्दोष हैं, लेकिन सुनेगा कौन?

अगर उन्हें (पुलिस द्वारा) उठा लिया गया तो हमारी देखभाल कौन करेगा? मेरे पति का नाम मतदाता सूची पर पुन दर्ज हो गया है, लेकिन वह वोट डालने के लिए वापस नहीं आयेगा। ज़मीनी रिपोर्ट से मालूम होता है कि मोथाबरी के अनेक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में वयस्क पुरुष अपने घरों से फरार हैं। हालांकि इस संदर्भ में कोई आधिकारिक संख्या नहीं हैं, लेकिन वीरान चौराहे, बंद दुकानें और भयावह ख़ामोशी अपनी दास्तान खुद बयान कर रही है। इन लोगों के मतदान न करने से किस पार्टी को फायदा होगा और किस पार्टी को नुकसान, यह तो मुद्दा ही नहीं है, सवाल यह है कि मतदाता सूची से किसी का नाम हटाकर या भय के कारण किसी का मतदान न कर पाना, लोकतंत्र को मज़बूत करेगा या कमज़ोर? इस प्रश्न पर गहन मंथन की आवश्यकता है।
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