पावन यज्ञ

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चूल्हे की आँच में जलती समर्पण की लौ
मिट्टी के बर्तन में उबलता स्नेह घना
रसोई यहाँ केवल भोजन का स्थान नहीं
यह घर के जीवन का पावन यज्ञ बना।।
हर दाना जैसे मंत्र बनकर पकता है
हर आंच में त्याग की सुगंध बसती है
माँ के हाथों की थाली जब सजती है,
घर की हर भूख तभी सच्चे सुख से हँसती है।।
रसोई का यह साधारण-सा दृश्य
दरअसल प्रेम का महान अनुष्ठान है।

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गोपाल कौशल भोजवाल (मध्य प्रदेश)

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