भावनाओं का प्रतिनिधित्व
पत्रकारिता जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। सूचनाओं और समाचारों को पाठकों तक पहुंचाते हुए हर शब्द में इस बात का प्रयास किया जाता है कि वह जनहित में हो। मिलाप अख़बार के संस्थापक व स्वतंत्रता सेनानी युद्धवीर जी ने 1950 के वर्ष के अंतिम दिनों में क्या क्रांति होगी शीर्षक से एक लेखमाला लिखी थी, जिसमें उन्होंने तत्कालीन हैदराबाद और हैदराबाद की जनता की भावनाओं को उजागर किया था। उस लेख माला पर देश भर से लोगों ने पत्र लिखे थे और स्पष्टीकरण मांगा था।
उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए युद्धवीर जी ने फिर से एक लेख माला लिखी। स्पष्टीकरण शीर्षक से लिखे गये उन लेखों में युद्धवीर जी ने पत्रकार और पत्रकारिता के उद्देश्य अपने कर्तव्य की सीमा और उसकी प्रतिक्रिया और प्रभाव क्षेत्र को भी स्पष्ट किया था। उन्होंने लिखा था, निस्संदेह मेरे शब्द, मेरे धारावाहिक लेख उनकी परेशानी और बेचैनी को दूर नहीं कर सकते, उनकी समस्याओं को सुलझा नहीं सकते।
पर हाँ, उन्हें इतनी सांत्वना आवश्य हो जाती है कि उनकी भावनाओं का प्रतिनिधित्व हो रहा है। और फिर मैं तो जनता की भावनाओं का रूप हूँ, एक पत्रकार हूँ। अपना दृष्टिकोण आपके सामने रख सकता हूँ। मैं कोई कूटनीतिज्ञ नहीं हूँ, कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूँ और न राजनीतिक क्षेत्र का कोई खिलाड़ी हूँ, जो किसी आंदोलन को चला सकूँ।
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परंतु इतना तो मैं आवश्य चाहता हूँ कि उन राजनीतिक दलों और संस्थाओं का कर्तव्य है कि जिस जनता का वह प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, उस जनता की भावनाओं का सम्मान करें, उनकी कठिनाइयों को समझें और कोई उचित कार्य करें, जिससे बेचैन जनता कुछ शांति का अनुभव करे।
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