सड़क, तुम अब आई हो गाँव
सड़क, तुम अब आई हो गाँव
जब सारा गाँव शहर जा चुका है
जिन गलियों में बचपन चहकता था
अब वहाँ सन्नाटा बैठा है।
खेत सूने हैं, मेड़ों पर बस घास उगी है
न अँगीठी की आँच है, न चूल्हे की गंध
बुज़ुर्ग अब भी चौपाल पर बैठे हैं
पर सुनने वाला कोई नहीं बचा
तुम्हारे डामर पर अब कौन चलेगा
यहाँ अब न मेले लगते हैं
न बारातें निकलती हैं
बस कभी-कभी डाकिया आता है
और लौट जाता है बिना किसी ख़त के।
कभी तुम आती तो गाँव रुक जाता
युवाओं के सपनों को पंख लग जाते
मिट्टी की खुशबू शहर तक जाती
पर अब जब तुम आई हो सड़क
तो मिट्टी की महक भी थक चुकी है।

सड़क, तुम अब आई हो गाँव
जब गाँव का दिल शहर में बस चुका है
अब तुम्हारे दोनों छोरों पर
स़िर्फ वापसी की प्रतीक्षा बाकी है।
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