सागरमाथा संवाद : ख़तरे में हिमालय!
पर्वतराज हिमालय न केवल भारत की शान है, बल्कि यह हमारी जीवनरेखा भी है। यह विशाल पर्वत श्रृंखला नदियों का स्रोत, जैव-विविधता का खजाना और जलवायु का नियामक है। लेकिन आज हिमालय के हिमनद, जो इसकी आत्मा हैं, तेजी से पिघल रहे हैं। हाल ही में काठमांडू (नेपाल) में आयोजित सागरमाथा संवाद में इस संकट पर गहरी चिंता जताई गई।
भारत के नजरिए से यह मुद्दा केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और रणनीतिक भी है। हिमालय के हिमनदों का पिघलना जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। दरअसल, हिमालय क्षेत्र में हिमनद, कई सदियों से ताज़ा जल का अहम स्रोत रहे हैं। मगर, उनके पिघलने की रफ़्तार में आई तेज़ी से स्थानीय समुदायों और हिमालय में स्थित जल स्रोतों पर निर्भर आबादियों के लिए ख़तरा है।
हिमालयी संकट: जल, ऊर्जा और आजीविका पर असर
सागरमाथा संवाद में भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया कि हिमालय क्षेत्र में पर्यावरणीय संकट का भारी बोझ है। भारत इस संकट का प्रत्यक्ष साक्षी है क्योंकि यहाँ हिमालय का बड़ा हिस्सा फैला हुआ है। गंगोत्री, यमुनोत्री और सियाचिन जैसे हिमनद हर साल सिकुड़ रहे हैं। इससे न केवल जल संसाधनों पर खतरा मँडरा रहा है, बल्कि हिमनदीय झीलों के फटने से बाढ़ का जोखिम भी बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में 2021 की चमोली आपदा के दौरान हिमनद टूटने से भयंकर मची तबाही इस खतरे की गंभीरता को दर्शाती है।
हिमालय भारत की नदियों का उद्गम है। करोड़ों लोगों की प्यास बुझाने और खेती को सींचने वाली गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ हिमनदों पर निर्भर हैं। अगर हिमनद इसी गति से पिघलते रहे, तो जल संकट गहराएगा। भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ अर्थात खेती बुरी तरह प्रभावित होगी। साथ ही, हिमालयी नदियों पर निर्भर जलविद्युत परियोजनाएँ भी ठप्प हो सकती हैं। सागरमाथा संवाद में यह बात रेखांकित की गई कि हिमनदों का पिघलना भारत की ऊर्जा और जल सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।
इस संकट का सामाजिक पहलू भी गंभीर है। हिमालय क्षेत्र में करीब 5 करोड़ लोग रहते हैं, जो पहाड़ी खेती और पर्यटन पर निर्भर हैं। हिमनदों के सिकुड़ने से पानी की कमी होगी, जिससे खेती और आजीविका प्रभावित होगी। साथ ही, बढ़ती प्राकृतिक आपदाएँ लोगों को पलायन के लिए मजबूर करेंगी। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में पहले से ही बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यह स्थिति न केवल स्थानीय समुदायों, बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है।
यह भी पढ़ें… मुस्लिम जगत का चौधरी बनने को बेकरार एर्दोगन!
हिमालय संरक्षण: भविष्य की सुरक्षा की साझा ज़िम्मेदारी
इतना ही नहीं, गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिन्धु समेत अन्य नदियों में प्रवाह घटने से दक्षिण एशिया में क़रीब दो अरब लोगों के लिए खाद्य उत्पादन पर जोखिम मँडराएगा जो सामूहिक विस्थापन की भी वजह बन सकता है! भारत ने इस संकट से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। 2008 में शुरू की गई जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) के तहत हिमालयी पर्यावरण को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन चल रहा है। सागरमाथा संवाद में भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया।
हिमालय क्षेत्र के देशों को मिलकर हिमनदीय झीलों की निगरानी और आपदा चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना होगा। भारत ने हिंद महासागर में सुनामी चेतावनी प्रणाली की तर्ज पर हिमालय के लिए ऐसी व्यवस्था की वकालत की है। लेकिन, केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं हैं।
हमें सामूहिक जिम्मेदारी लेनी होगी। उद्योगों को कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा। आम नागरिकों को ऊर्जा संरक्षण और वृक्षारोपण जैसे छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे। साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित पर्यटन और निर्माण पर रोक लगानी होगी। याद रहे, हिमालय केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का आधार है। हिमालय की रक्षा करके ही हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।
अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।



