देवर्षि हैं मुनि नारद

तिथि मुहूर्त

अंग्रेजी कैलंडर के अनुसार इस वर्ष विक्रम पंचांग के ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि 2 मई, शनिवार की मध्य रात्रि 12 बजकर 51 मिनट पर शुरु हो रही है, जो 3 मई, रविवार की मध्य रात्रि के बाद 3 बजकर 2 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि की गणना के अनुसार, 3 मई, रविवार को नारद जयंती मनाना शास्त्र सम्मत होगा।

नारद जयंती हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर मनाई जाती है। मान्यता है कि देवर्षि नारद इसी तिथि पर प्रकट हुए थे। पौराणिक कथाओं में नारदजी बेहद लोकप्रिय हैं और वे ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से एक है। वहीं, कहा जाता है कि भगवान विष्णु के जिन 24 अवतारों के बारे में बताया गया है, उनमें से एक देवर्षि नारदजी हैं। इस दिन भगवान विष्णु और नारद जी की पूजा करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से जातक को विष्णुजी की कृष्ण प्राप्त हो सकती है, जिससे जीवन में सुख-शांति आती है।

पूजा विधि

इस दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करें। पूजाघर की सफाई करके चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें। पहले भगवान विष्णु की पूजा करें। उन्हें ताजे पुष्प, फल, चंदन, कुमकुम आदि अर्पित करें और धूप, दीप आदि के साथ विधि-विधान से पूजा एवं आरती करें। इसके बाद, नारदजी की भी आराधना विधि-विधान से करें।

पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पंचामफत का भोग अवश्य लगाएं और उसमें तुलसी दल को शामिल करें। मान्यता है कि नारद जयंती पर भगवान विष्णु के साथ नारदजी की पूजा करने से साधक पर विष्णुजी की कृपा बनी रह सकती है। त्रषि नारद जो भगवान विष्णु के परम भक्त और भगवान ब्रह्मा के पुत्र हैं से जुड़ी पौराणिक कथाएँ अनादि काल से कही और सुनी जाती रही हैं।

नारद को भगवान ब्रह्मा का छठा पुत्र माना जाता है। सभी त्रषियों में नारद को देवर्षि का विशिष्ट खिताब प्राप्त है। त्रषि नारद का महत्व इस बात से स्पष्ट है कि उन्हें न केवल देवताओं के बीच, बल्कि असुरों के बीच भी बहुत सम्मान प्राप्त था। श्रीमद्भगवद्गीता में त्रषि नारद का उल्लेख करते हुए, भगवान कृष्ण कहते हैं-

देवर्षीणां च नारद अर्थात दिव्य त्रषियों में मैं नारद हूँ। देवर्षि नारद को अनेक शास्त्रां और विषयों के गहन विद्वान के रूप में पूजा जाता है, जिनमें श्रुति और स्मफति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल विज्ञान, भूगोल, ज्योतिष और योग आदि शामिल हैं। सभी देवर्षि नारद की शिक्षाओं का सार इस सूत्र में समाहित किया जा सकता है-

सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तैः भगवान एव भजनीय अर्थात्, मनुष्य को सदैव, पूर्ण निष्ठा और चिंता मुक्त मन से अपनी भक्ति केवल परम प्रभु पर ही पेंद्रित करनी चाहिए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नारद जयंती को नारद जी की पूजा-अर्चना करने से ज्ञान, बल और बुद्धि की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान विष्णु के मंदिर में बांसुरी अर्पित करनी चाहिए।

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