स्वयं की तलाश
किसी की मन्नत की गांठ भी नहीं थी,
न किसी के ख़्वाबों की कोई बुनावट में थी।
किसी ने पुरज़ोर कोशिश भी न की,
बस जो मिला, उसे ख्वाहिश कह दिया।
कभी लगा, शायद मैंने ज़्यादा मांग लिया,
कभी लगा, यह किरदार मेरा ह़कदार कहा गया।
शब्दों और भावों की भीड़ में,
सामाजिक स्वीकृति और पारिवारिक सहमति की दीवारें खड़ी थीं।
बस विरोध था, अव्यक्त क्षोभ का क्षण था,
किस्से और तमाशे थे- ज़माने भर के।
असल चुनाव तो बस जीवन-बसर का होता है,
क्योंकि जीने की समझ जब तक आती है,
जीवन का वक्त आधा बीत चुका होता है।
तब न अहम रह जाता है,
न संबंधों में प्रश्न शेष रहता है।
स़िर्फ एक पुकार-
स्वयं को स्वीकार कीजिए।
बहुत उम्र बीत गई परतंत्रता में,
अब प्रतीक्षा में स्वयं को व्यर्थ मत कीजिए।
जहां आपकी अस्मिता आहत हो,
वहां खुद को साबित करना
कभी सार्थक नहीं होता।

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