प्रकृति की रक्षा का संदेश देता पर्व
गौवर्धन पर्व को अन्नकूट पर्व भी कहते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोक जीवन में काफी महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा संबंध दिखाई देता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन इंद्र का मान-मर्दन करके गिरिराज की पूजा की थी। कबीर दास जी कहते हैं-
कबीर गोवर्धन कृष्ण जी उठाया, द्रोणागिरि हनुमंत। शेष नाग सब सृष्टि उठाई, इनमें को भगवंत।।
इस दिन मंदिरों में अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। यह एक प्रकार से सामूहिक-भोज होता है जिसमें पूरा परिवार एक जगह बनाई रसोई से भोजन करता है। इस दिन चावल, बाजरा, कढ़ी, साबुत मूंग तथा सभी सब्जियों को मिलाकर कूट बनाया जाता है। सायं काल गोबर के गोवर्धन बनाकर पूजा की जाती है।
गाय, गोवर्धन और विश्वकर्मा की एक साथ होती है पूजा
अन्नकूट में चंद्र-दर्शन अशुभ माना जाता है। यदि प्रतिपदा में द्वितीया हो तो अन्नकूट अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन संध्या के समय दैत्यराज बलि की पूजा भी की जाती है। गोवर्धन गिरि को भगवान का स्वरूप माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा अपने घर में करने से धन, धान्य, संतान और गोरस की वृद्धि होती है।
यह तिथि तीन उत्सवों का संगम मानी गई है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा की भी पूजा की जाती है। भगवान विश्वकर्मा और मशीनों का दोपहर के समय पूजन किया जाता है। गोवर्धन पूजा में गोधन (गाय) की पूजा की जाती है। शास्त्रां में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र है, जैसे नदियों में गंगा। इसी दिन गोधन को स्नान कराकर फूल माला, धूप, चंदन आदि से उनकी पूजा की जाती है। गायों को मिठाई खिलाकर आरती उतारी जाती है।
यह ब्रजवासियों का मुख्य त्योहार है। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारंभ हुई। उससे पूर्व लोग इंद्र भगवान की पूजा करके छप्पन प्रकार का भोग लगाते थे। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को गोर्वधन की पूजा की जाती है।
पूजा विधि
आज प्रात गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में गोवर्धन बनाया जाता है। अनेक स्थानों पर इसे मनुष्याकार बनाकर पुष्पों एवं लताओं आदि से सजाया जाता है। इनकी नाभि के स्थान पर एक कटोरी या मिट्टी का दीपक रखा जाता है, जिसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे आदि रखे जाते हैं, जिसे बाद में प्रसाद रूप में बांटा जाता है।
शाम को गोवर्धन की पूजा की जाती है। पूजा में धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल, खील, बताशे आदि का प्रयोग किया जाता है। पूजा के बाद गोवर्धनजी की जय बोलते हुए, उनकी सात परामा की जाती हैं। परामा के समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा व अन्य जौ लेकर चलते हैं। जल के लोटे वाला व्यक्ति पानी की धारा गिराता हुआ तथा अन्य जौ बोते हुए परामा पूरी करते हैं।
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महाराष्ट्र में यह दिन बालि प्रतिपदा या बालि पड़वा के रूप में मनाया जाता है। भगवान विष्णु के एक अवतार वामन की राजा बलि पर विजय और बाद में राजा बलि को पाताल लोक भेजने के कारण इस दिन उनका पुण्य स्मरण किया जाता है। माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बलि इस दिन पाताल लोक से पृथ्वी लोक आता है। इस पर्व को गुजराती नव-वर्ष के रूप में मनाया जाता है।
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