स्वयं के भीतर है परमानंद का सरोवर
हमारा तर्कशील मन छोटा-सा है। दिमाग का केवल बारह प्रतिशत हिस्सा चेतन है और बाकी अठासी प्रतिशत अवचेतन है, लेकिन आत्मज्ञान के अभ्यास से इस चेतन मन को स्वासों की धुन में लीन करके इतना सबल बनाया जा सकता है कि वो अवचेतन हिस्से पर भी आवश्यक नियंत्रण कर सकता है। अभी तो हम बहुत तरह के नशों में जी रहे हैं। कोई धन के नशे में, कोई पद के नशे में, कोई प्रतिष्ठा के नशे में और कोई अहंकार के नशे में जी रहा है।
जब मन अभ्यास से स्वासों के साथ एकाकार हो जाता है तब ये सब नशे छूट जाते हैं और तब एक ही नशा होता है और वो है आनंद का नशा। उसके बाद व्यक्ति की बेहोशी के बीच होश का दीया जलता है। जब साधक हृदय का अनहद नाद सुनता है तब परमानंद में मस्त हो जाता है। ऐसा अनुभव होने पर बाहर हम मानवता के साथ होते हैं और भीतर हमारा ठहराव परमानंद के साथ होता है। यही जीवन का उत्सव है और यही मनुष्य जीवन की सफलता है।
नकारात्मक सोच का निदान और स्वासों से आत्मचेतना का जागरण
ज्ञान के नियमित अभ्यास से हर किस्म की लत से मुक्ति पाना पूरी तरह संभव है। स्वयं की ग्रंथियों, उलझावों, निराशाजन्य कृत्यों, हालात, विचलन-सब पर गहराई से चिंतन करें। जैसे हर रोग का निदान आवश्यक है, तभी उसका उचित समाधान संभव है, ऐसे ही नकारात्मक विचारों से मुक्ति तब तक मुमकिन नहीं है जब तक कि हम उसकी असल वजहों की पहचान न कर पाएं।
बगैर निदान के उपचार कोई करे भी तो कैसे करे। इसलिए विचलित जब भी हों तो पलायन का रास्ता चुनने की जगह अभ्यास से मन को स्वासों की धुन में लीन करके हृदय में लहरा रहे परमानंद के सरोवर में डुबकी लगाएं और स्वयं के संसार में होने की सार्थकता का बोध करके मनुष्य जीवन सफल बनाएं।
दुख और तनाव की आदतें बदलें, सुखी जीवन अपनाएं
हमारा मन ज्यादातर समय दुःख और टेंशन में क्यों रहता है? हमने इस प्रकार की सोच के बीज का रोपण किया हुआ है कि मन सदैव यही सोचता है कि ऐसा न हुआ तो क्या होगा और वैसा न हुआ तो क्या हो सकता है? सारे दुःख व टेंशन हमारी नासमझी और इसी गलत सोच के कारण मौजूद हैं। इसलिए सिर्फ अपनी सोच बदल दीजिए, सारे दुःख व टेंशन उसी वक्त खत्म हो जाएंगे। ऐसा नहीं है कि जितने भी महान पुरुष हुए हैं, उनके जीवन में सब कुछ अच्छा-अच्छा ही हुआ हो, लेकिन वे चौबीस घंटे आनंद में रहते थे।
गुरु नानक देव जी एक तारे की तान पर गीत गाते चलते थे और आनंदित रहते थे। कबीरदास जी कपड़ा बुन कर बेचते, तब उनके खाने का जुगाड़ होता था, लेकिन वे यही कहते थे कि, आनंद झरता रहता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सुख और दुःख सिर्फ आदतें हैं। दुःखी और परेशान रहने की आदत के बीजों का हमने गहराई से रोपण किया हुआ है। हम अगर दुःखी रहने की आदत डाल सकते हैं तो सुखी रहने की आदत भी डाल सकते हैं।
बेशर्त आनंद का अभ्यास और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आकर्षण
कृपया एक प्रयोग करें और तुरंत उसका परिणाम भी देख लीजिए। हर रोज सुबह उठते ही आने-जाने वाली स्वासों को हृदय से स्वीकार करके खुद को आनंद के भाव से भर लीजिए। ध्यान के अभ्यास से इसे ही स्वभाव बना लेना और आदत में शामिल कर लेना है। यह गलत सोच है कि इतना धन, पद, प्रतिष्ठा मिल जाए तो आनंदित हो जाएंगे, लेकिन इसे एक शर्त नहीं बनाना है क्योंकि जिसने भी अपने आनंद पर शर्त लगायी, वह आज तक आनंदित नहीं हो सका।
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अगर आपने बेशर्त आनंदित जीवन जीने का अभ्यास शुरू कर दिया तो ब्रह्मांड की सारी शक्तियां आपकी ओर आकर्षित होने लगेंगी। पहले ज्ञान के अभ्यास से अपने स्वासों के भीतर की शक्ति को पहचानकर हृदय में विराजमान परमात्मा के राज्य में प्रवेश तो करो, बाकी सभी चीजें तुम्हें अपने आप मिलती चली जाएंगी। पूरा ब्रह्मांड तुम्हारा है। भीतर से आनंद हर पल झरता रहता है और जीवन सफल हो जाता है। यही मनुष्य जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
-आर.डी.अग्रवाल प्रेमी
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