बचपन में ही सुलझ जाएगा मोटापे का गणित

Ad

2035 तक दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी मोटापे से ग्रस्त होने की आशंका

हैदराबाद, दुनिया की बड़ी आबादी मोटापे से ग्रस्त है। इससे बचने के प्रयास भी लगातार किये जा रहे हैं। हैदराबाद के वैज्ञानिक संस्थान सीसीएमबी सहित विश्व भर के सैकड़ों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक शोध किया है, जिसके परिणाम बताते हैं कि पांच साल की उम्र में यह पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति वयस्क होकर मोटापे का शिकार होगा या नहीं। वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे मोटापे से बचने के लिए उपाय करने में कारगर सहयोग मिल सकता है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि मोटापा बच्चों और किशोरों से लेकर वयस्कों तक दुनिया भर के लोगों को प्रभावित कर रहा है। यह न केवल सामाजिक मुद्दा है, बल्कि मधुमेह, हृदय रोग, हड्डियों की खराब सेहत, प्रजनन संबंधी समस्याओं और कैंसर जैसी गैर-संचारी बीमारियों के जोखिम को भी बढ़ा रहा है। विश्व मोटापा महासंघ का अनुमान है कि 2035 तक दुनिया की आधी से ज़्यादा आबादी ज़्यादा वज़न या मोटापे से ग्रस्त होगी।

इस स्थिति के मद्देनज़र दुनिया भर के विशेषज्ञों ने मोटापे की आनुवंशिकी पर एक विश्वव्यापी अध्ययन किया है। लगभग 500 संस्थानों के 600 शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने अब तक के सबसे बड़े और सबसे विविध आनुवंशिक डेटासेट का उपयोग करते हुए शोध किया है। इस शोध में जाइंट कंसोर्टियम और उपभोक्ता डीएनए परीक्षण फर्म 23 एंड मी का आनुवंशिक डेटा भी शामिल है।

बचपन में मोटापे का पूर्वानुमान लगाने वाली नई आनुवंशिक खोज

शोध के अंतर्गत भारत सहित विभिन्न देशों के पाँच मिलियन से अधिक लोगों की आनुवंशिक जानकारी प्राप्त की गयी। इस डेटा का उपयोग करके विशेषज्ञों ने पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर (पीआरएस) नामक एक आनुवंशिक परीक्षण विकसित किया, जिसके माध्यम से बचपन में ही वयस्कता के मोटापे का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। यह खोज उन बच्चों और किशोरों की पहचान करने में मदद कर सकती है, जिनमें पहले से ही मोटापे के विकास का उच्च आनुवंशिक जोखिम है और जिन्हें कम उम्र में जीवनशैली में बदलाव जैसी लक्षित निवारक रणनीतियों से लाभ हो सकता है।

दावा किया गया है कि यह स्कोर किसी व्यक्ति में मोटापा विकसित होने के जोखिम का पूर्वानुमान लगाने में पिछले सर्वोत्तम परीक्षण से दोगुना प्रभावी है। नेचर मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित शोध के प्रमुख लेखक व कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एनएनएफ सेंटर फॉर बेसिक मेटाबोलिक रिसर्च (सीबीएमआर) के सहायक प्रो.रोलोफ स्मित बताते हैं कि पीआरएस पांच वर्ष की आयु के आसपास यह पूर्वानुमान लगाने में सक्षम है कि क्या किसी बच्चे में वयस्कता में मोटापे की संभावना है, वह भी तब जब अन्य जोखिम कारक बचपन में उसके वजन को प्रभावित करना शुरू नहीं करते।

इस समय हस्तक्षेप करने से बहुत बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।सीसीएमबी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में मोटापा एक गंभीर समस्या है, जहाँ मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों की घटनें आम हैं। उनका मानना है कि भारत में मोटापे का पैटर्न यूरोप से क़ाफी अलग है। विशेषकर भारतीयों में पेट का मोटापा ज़्यादा पाया जाता है। सीएसआईआर-कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (सीएसआईआर-सीसीएमबी), हैदराबाद के डॉ. गिरिराज रतन चांडक द्वारा किए गए पूर्व अध्ययनों का भी सहयोग इस शोध में लिया गया है।

भारतीयों में मोटापे के पीछे अलग जेनेटिक कारण

अध्ययन परिणामों में कहा गया था कि भारतीयों और यूरोपीय लोगों में गैर-संचारी रोगों का आनुवंशिक आधार क़ाफी भिन्न होता है। नये शोध में डॉ. चांडक के नेतृत्व में सीसीएमबी के शोधकर्ताओं ने भारतीय आबादी के जीनोम का अध्ययन किया। इसमें मधुमेह रोगियों के साथ-साथ सामान्य रक्त शर्करा स्तर वाले व्यक्तियों को भी शामिल किया गया, जिनका लगभग बीस वर्षों तक अनुसरण किया गया, जिससे भारतीयों में मोटापे के आनुवंशिक आधार की जाँच की गयी।

मोटापे से जुड़े कई आनुवंशिक परिवर्तनों की पहचान की गई और उनका उपयोग भारतीयों के लिए पीआरएस विकसित करने के लिए किया गया। भारतीय नमूनों से प्राप्त इस डेटा के अध्ययन से निकाला गया निष्कर्ष भारतीय और दक्षिण एशियाई आबादी के लिए अधिक प्रासंगिक हो गया है।

डॉ. चांडक ने हिंदी मिलाप के साथ बातचीत में बताया कि वैज्ञानिकों ने किसी व्यक्ति के मोटापे के आनुवंशिक जोखिम और जीवनशैली से जुड़े वज़न घटाने के उपायों, जैसे कि आहार और व्यायाम, के प्रभाव के बीच संबंध की भी जाँच की। उन्होंने पाया कि मोटापे के उच्च आनुवंशिक जोखिम वाले व्यक्तियों ने उपायों पर बेहतर प्रतिक्रिया दी, लेकिन उपायों के समाप्त होने के बाद उनका वज़न फिर तेज़ी से बढ़ गया। उन्होंने बताया कि इस शोध में हालाँकि यूरोपीय देशों का डेटा अधिक था, इसलिए इसके परिणाम वहाँ के अनुवांशिक कारणों पर अधिक सटीक हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट हुई है कि इस परिणाम से भारतीयों के मोटापे को समझने और इस दिशा में एक और शोध करने की संभावनें उभरी हैं।

यह भी पढ़े : गले को सुखद अहसास देते है पानी के गरारे

डॉ. चांडक ने कहा कि यूरोपीय लोगों में मोटापे से जुड़े कई जीन वेरिएंट भारतीयों को समान रूप से प्रभावित नहीं करते। यूरोपीय लोगों में पहचाने गए आनुवंशिक वेरिएंट ने भारतीयों में कम जोखिम का अनुमान है। भारतीयों में जेनेटिक मोटापे का प्रभाव कम है, लेकिन पर्यावरण, जीवनशैली, आहार और पोषण भारतीयों में मोटापे का प्रमुख कारण है। इसलिए भारतीयों के लिए आनुवंशिक जोखिम की पृष्ठभूमि में जीवनशैली समाधान या विशिष्ट पोषक तत्वों की खुराक बेहतर परिणाम दे सकती है। उन्होंने बताया कि जीन से होने वाले परिणामों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन पर्यावरण एवं जीवन शैली से होने वाले परिणामों को बदला जा सकता है।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Ad

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button