लोकसभा अध्यक्ष पर प्रस्ताव पास तो नहीं हुआ मगर यह लोकतंत्र पर एक धब्बा है!

सत्ता पक्ष का मानना है कि वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर लाया गया अविश्वास प्रस्ताव वास्तव में राजनीतिक स्टंट है और इसके जरिये वे येन-केन-प्रकारेण सरकार को काम नहीं करने देना चाहते। लेकिन विपक्ष इस बात को सही नहीं मानता। विपक्ष का कहना है कि मौजूदा सरकार संसद में असहमति को, ताकत के जरिये कुचलने की कोशिश कर रही है। इसलिए लोकतंत्र की लड़ाई इतनी उग्र और व्यक्तिगत हो गई है। अगर इस पूरे विवाद को वास्तविकता के चश्मे से देखें तो साफ पता चलता है कि सरकार की नैतिक स्थिति सवालिया घेरे में है और राजनीतिक माहौल में लगातार ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। ऐसे में जब संसद को एकजुट होकर देश को आगे ले जाने का ईमानदारी से काम करना चाहिए, आरोप-प्रत्यारोप का यह सारा खेल निजी राजनीति के इर्दगिर्द केंद्रित हो गया है।

जिस समय मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं, संसद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर बहस जारी है। उन पर यह अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला फरवरी 2026 में विपक्ष के 118 सांसदों के हस्ताक्षर के जरिये हुआ था और जब 9 मार्च 2026 को बजट सत्र के दूसरे दौर में इसे चर्चा के लिए पेश किया गया, तो 50 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए। क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष को अपने पद से हटाने के लिए संसद में साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है और विपक्ष के पास यह बहुमत नहीं है।

इसलिए यह तो पहले से तय है कि ओम बिरला को विपक्ष उनके पद से हटा नहीं सकता, लेकिन उन पर जिस तरह से यह प्रस्ताव लाया गया है और जो आरोप लगाये गये हैं, उससे न सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष बल्कि मौजूदा संसद की भी गरिमा कम होती है। विपक्ष ने उन पर यह प्रस्ताव पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा न कराने व विपक्ष के राजनेताओं को बोलने न देने के आरोप के तहत लेकर आये।

संख्या बल के कारण प्रस्ताव पास होना मुश्किल

यह प्रस्ताव फरवरी 2026 में पेश किया गया था और 9 मार्च 2026 को इस पर बोलते हुए कांग्रेस के गौरव गोगोई ने कहा, ओम बिरला विपक्ष के साथ पक्षतापूर्ण व्यवहार करते हैं। विपक्ष का आरोप है कि वह संसद में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी और कुछ महिला सांसदों को तो बोलने ही नहीं देते। गौरतलब है कि अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया नहीं गया, लेकिन अब तक विपक्ष द्वारा अलग-अलग समय पर चार लोकसभा अध्यक्षों पर अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है।

सबसे पहले यह अविश्वास प्रस्ताव 1954 में लोकसभा के पहले अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर पर लाया गया था। वह 15 मई 1952 से 27 फरवरी 1956 तक इस पद पर रहे थे। उनके खिलाफ 1954 में विपक्ष द्वारा भेदभावपूर्ण व्यवहार किए जाने का आरोप लगाया गया था। लेकिन संसद ने विपक्ष के इस आरोप को खारिज कर दिया। इसके बाद साल 1966 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकूम सिंह के खिलाफ, 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ और अब 2026 में ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया है, लेकिन अभी तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष के विरूद्ध यह प्रस्ताव पास नहीं हुआ।

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संख्या बल के कारण प्रस्ताव पास होना मुश्किल

ओम बिरला के विरूद्ध भी यह प्रस्ताव पास नहीं होगा, कम से कम गणित का हर तर्क तो यही कहता है और जिस तरह की समीकरणात्मक राजनीति मौजूदा दौर में हो रही है, उसके कारण किसी विचार के लिए चमत्कार होने की कोई दूर-दूर तक संभावना नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि आखिर जिस अध्यक्ष पर सदन के सभी सदस्यों को एक निगाह से देखने और किसी तरह के राजनीतिक भेदभाव न किए जाने की उम्मीद की जाती है, आखिर उतने महत्वपूर्ण और गरिमामय पद पर पहुंचने वाले लोगों पर इस तरह के आरोप क्यों लगते हैं?

जाहिर है कारण यही होता है कि लोकसभा अध्यक्ष आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के सदस्यों का समय-समय पर साथ देते हैं। क्योंकि आमतौर पर वह सत्तारूढ़ पार्टी अथवा गठबंधन से ही होते हैं। इस तरह उन पर एक तरह से संसद में अपने पक्ष के सांसदों को संरक्षण देते देखा जाता है, जो कि लोकतंत्र के लिए घातक है। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र साधारण नहीं है, यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के मुताबिक लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ उन्हें हटाने का सदन में प्रस्ताव तो लाया जा सकता है, लेकिन यह बेहद दुर्लभ स्थिति होती है। क्योंकि स्पीकर यानी अध्यक्ष को मानकर चला जाता है कि वह निष्पक्ष और गैरदलीय सदस्य की तरह व्यवहार करे। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के मामलों में यह तीन कारणों से बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। जिस तरह उनके खिलाफ चल रहे सत्र में 118 सांसदों ने हस्ताक्षर करके प्रस्ताव लाने की भूमिका बनायी, वह सीधे संसद की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।

संसद भारतीय लोकतंत्र का सामूहिक प्रतिनिधित्व

क्योंकि राजनीतिक पार्टियां भले व्यक्तिगत रूप से सदन में अलग-अलग पक्ष होती हों, लेकिन समग्रता में संसद भारतीय लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसे में जब अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति पर पक्षपात का आरोप लगता है, तो यह आरोप किसी एक व्यक्ति, किसी एक पार्टी या किसी एक गठबंधन तक सीमित नहीं रहता। वह आरोप और दूसरे शब्दों में यह कलंक समूचे भारतीय लोकतंत्र का हो जाता है।

अगर हाल फिलहाल में हम संसदीय कार्यवाईयों पर गिरते समय की चर्चा न भी करें, तो जिस तरह से सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे के साथ सदन में व्यवहार करते हैं, उसे देखकर एक आम लोकतंत्र प्रेमी और हितैषी व्यक्ति का तो दिल ही टूट जाता है। भले सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो ही एक-दूसरे पर आरोप लगाते हों, लेकिन यह तो आरोप बिना लगाये भी देखा जा सकता है कि किस तरह सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर इन दिनों कतई विश्वास नहीं करता। यह अविश्वास न सिर्फ खतरनाक है बल्कि लोकतंत्र पर सवालिया निशान खड़ा करता है। इससे पता चलता है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज का ढंग कितना पक्षपाती हो गया है।

अगर संसद में दो पक्ष यानी सत्ता पक्ष और विपक्ष किसी भी मुद्दे पर, किसी भी स्थिति में एकमत न हों तो फिर लोकतंत्र का मतलब ही क्या रह जाता है? लोकतंत्र का मतलब सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल, खेलना नहीं होता बल्कि सही मायनों में असहमति के बावजूद एक तार्किक सहमति से देश को आगे बढ़ाने का राजनीतिक उपाय होता है। लेकिन अब कुछ ऐसी स्थितियां बन गई हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे की किसी भी बात को जरा भी महत्व नहीं देती।

संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ता टकराव

विपक्ष, सत्ता पक्ष के किसी भी काम को कभी स्वीकृति नहीं देता, तो सत्ता पक्ष विपक्ष को महत्वपूर्ण मानने से ही इंकार करता है। इस मामले में ही देखें तो विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ओम बिरला विभिन्न बहसों में विपक्ष को बोलने का मौका ही नहीं देते। अगर उन्हें कभी मौका मिला भी तो उनके माइक बंद कर दिए जाते हैं। जैसे हाल में विपक्ष के कई नेताओं के बोलने के दौरान किया गया। मौजूदा विपक्ष का यह मानना है कि ओम बिरला विपक्ष के साथ प्रतिद्वंदियों या विरोधियों वाला बर्ताव करते हैं। जबकि भाजपा का कहना है कि विपक्ष जान-बूझकर संसद की कार्यवाईयों पर बाधा डालता है। इसलिए नियमों के अनुसार उनके विरूद्ध कार्यवाई की जाए।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

सत्ता पक्ष का मानना है कि वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर लाया गया अविश्वास प्रस्ताव वास्तव में राजनीतिक स्टंट है और इसके जरिये वे येन-केन-प्रकारेण सरकार को काम नहीं करने देना चाहते। लेकिन विपक्ष इस बात को सही नहीं मानता। विपक्ष का कहना है कि मौजूदा सरकार संसद में असहमति को, ताकत के जरिये कुचलने की कोशिश कर रही है। इसलिए लोकतंत्र की लड़ाई इतनी उग्र और व्यक्तिगत हो गई है। अगर इस पूरे विवाद को वास्तविकता के चश्मे से देखें तो साफ पता चलता है कि सरकार की नैतिक स्थिति सवालिया घेरे में है और राजनीतिक माहौल में लगातार ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। ऐसे में जब संसद को एकजुट होकर देश को आगे ले जाने का ईमानदारी से काम करना चाहिए, आरोप-प्रत्यारोप का यह सारा खेल निजी राजनीति के इर्दगिर्द केंद्रित हो गया है।

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