हमारे जीवन में भावनाओं की भूमिका
मनुष्य का मन भावनाओं का स्रोत है और हमारी दो विशेषताएँ- मन और बुद्धि, हमें मनुष्य की श्रेणी में रखती हैं। भावनाएँ हमारे विचारों का आधार हैं और जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने का सेतु भी। स्वाभाविक रूप से हमारे मन की भावनाओं के अनुरूप ही हमारे विचार उत्पन्न होते हैं। यदि हम अपनी भावनाओं को कोई दिशा नहीं देते हैं तो संसार की नकारात्मकता से प्रभावित होकर हमारा मन नकारात्मक भावनाएँ ही उत्पन्न करने लगता है। इसलिए हमें हमेशा जागरुक रहना है और अपनी भावनाओं को दिशा देनी है।
भावनाओं को दिशा देने का सबसे सरल उपाय प्रशंसा है। जैसे हम हमेशा प्रशंसा पाने के लिए उत्सुक रहते हैं, उसी तरह हम जिनके साथ रहते हैं, जिनसे मिलते हैं, जिनके साथ आचार-व्यवहार-व्यापार करते हैं, उनके छोटे से छोटे कार्यों और सहयोग की भी प्रशंसा करनी है। कई बार हम सामने वाले के कार्य, व्यवहार, सुंदरता या गुण को मन ही मन अच्छा मानते हैं, लेकिन अज्ञानतावश या संकोचवश उसे अभिव्यक्त नहीं करते या नजरअंदाज कर देते हैं।
प्रशंसा और सद्भाव से रिश्तों में बढ़ती है मिठास
बस इसी बिंदु पर हमें सतर्क और जागरुक रहना है। बिना किसी संकोच के, भले ही कितनी भी छोटी-सी बात हो, प्रशंसा के किसी भी अवसर को कभी नहीं चूकना। एक मुस्कान, समय पर दिया गया धन्यवाद या किसी की मेहनत को दो शब्द कहना, ये छोटी-छोटी अभिव्यक्तियाँ ही संबंधों में मिठास घोलती हैं। ज्ञानी लोगों ने कहा भी है- यद् भावं तद् भवति अर्थात जैसे हमारे भाव होते हैं, हम उसी प्रकार बनते चले जाते हैं।
तात्पर्य यह है कि हमारा जीवन, आचार-विचार, व्यवहार सब उसी के अनुरूप ढलने लगते हैं। यदि भाव शुद्ध हैं तो दृष्टि भी शुद्ध हो जाती है और संसार सुंदर लगने लगता है। भावनाएँ हमारे जीवन का कोई एक पहलू नहीं हैं, बल्कि शेष पूरा जीवन इसी के अनुसार बनता-चलता है। किसी की प्रशंसा करने का भाव भी तभी हमारे मन में उठता है, जब हम सामने वाले के गुणों पर ध्यान देते हैं। अत हर किसी पर पहली नजर पड़ते ही उसके गुणों को नोटिस करें।
यदि हम गुणों या अच्छाई को नोटिस करने का अभ्यास नहीं करेंगे तो साधारण रूप से हमारा मन हर किसी की कमियों को ही ढूँढता है और उनकी कमियां जानकर हमारे अहंकार की तृप्ति होती है। यह आदत धीरे-धीरे हमें अकेला कर देती है।
अहंकार के जाल से बचने के लिए और सद्भावों को भीतर विकसित करने के लिए हमें निरंतर अभ्यास करके सबमें परमात्मा की करुणा, दया, ममता और प्रेम के गुणों को ही देखना है।
सद्भाव और सकारात्मक सोच से जीवन बनता है आनंदमय
वास्तव में हम सब उस एकमात्र परमात्मा के ही अंश हैं। जब हम दूसरों में ईश्वर को देखेंगे, तो ईर्ष्या, द्वेष और तुलना अपने आप समाप्त हो जाएँगे। सद्भाव हमें स्वभाव की ओर ले जाता है यानी हम अपने मूल स्वरूप के निकट पहुँचने लगते हैं। सत्संग का श्रवण, ज्ञानी, संतों या गुरुओं के दर्शन और सान्निध्य से हमारी भावनाओं को सार्थक दिशा मिलती है और सद्भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए साहस।

जब तक हमें यह ज्ञान नहीं होता कि विचारों का स्रोत भावनाएँ हैं, तब तक व्यर्थ में हम अपनी पूरी ऊर्जा विचारों को नियंत्रित करने में लगाते जाते हैं। विचार नदी की धारा हैं, भावनाएँ उसका उद्गम। उद्गम शुद्ध होगा तो धारा स्वयं निर्मल बहती रहेगी।
सरलता और सहजता हमें सद्भावनाओं की ओर ले जाती है और सद्भावनाएँ सद्विचारों की ओर। जिसके जीवन में सद्भावनाएँ और सद्विचार हैं, उसका जीवन सफल, सार्थक और सदा आनंदित रहता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं तो आनंद में रहता है, अपने आस-पास के वातावरण को भी आनंदमय बना देता है।
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