वैतरणी पार कराती है गाय की पूंछ

यह लोक विश्वास है कि मृत्यु के बाद मृतक की आत्मा को स्वर्ग पहुंचने से पहले वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है। जो व्यक्ति मौत से पूर्व गो-दान करता है तो उसे गो-माता सहारा देती है और मृतक की आत्मा गो-माता की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करती है। जो गो-दान नहीं करता, वह मझधार में ही डूब जाता है। इसके बाद आत्मा अनंत काल तक वैतरणी में भटकती रहती है।

हिन्दू दर्शन के अनुसार, इस बात की बार-बार पुष्टि की जाती है कि मनुष्य में जीव तत्व निवास करता है, जो मृत्यु के बाद ब्रह्म में विलीन हो जाता है। मगर स्वर्ग तथा नर्क की अवधारणा ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या आदमी की आत्मा मृत्यु के बाद स्वर्ग अथवा नर्क में जाती है। यदि हां तो फिर लोगों का इस बात पर विश्वास कर लेना लाजिमी है कि जीवात्मा अनेक बाधाएं पार करते हुए देवलोक पहुंचती होगी।

सत्कर्म और श्रद्धा ही वैतरणी पार करने का सच्चा मार्ग

जहां तक गाय की पूंछ पकड़ कर वैतरणी पार करने की बात है तो यह अवधारणा इसलिए बनी कि लोग गाय को ज्यादा से ज्यादा सम्मान दें। इसलिए यह विचार भी चस्पां कर दिया गया कि यदि गो-दान न किया गया तो आत्मा वैतरणी में भटकती रहेगी। यदि इस भाव को प्रतीकात्मक रूप से भी स्वीकार करें तो हम यह कह सकते हैं कि यह संसार ही एक वैतरणी है। इससे पार पाने के लिए हमें सत्कर्म करने चाहिए ताकि मृत्यु के समय खुद को चैन मिले। हमारी आत्मा हमें ही बार-बार न कोसे।

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यह सही है कि सृष्टि में जिस चीज का आज अस्तित्व है, उसे एक दिन विलीन होना है। शरीर पांच तत्वों से बना है, इसलिए उसे इन तत्वों में मिल जाना है। इस तरह इसे ब्रह्म में लीन कहा जाता है। वैसे सच यह है कि भगवान के प्रति सात्विक श्रद्धा का होना ही गो के समान है। जैसाकि संत तुलसीदास ने कहा है- सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। शायद ईश्वर तक पहुंचने के लिए इससे बड़ा साधन और क्या हो सकता है? इसलिए हम ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखें। वही हमारी नैया को वैतरणी के पार लगाएगा।

नरेंद्र देवांगन

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