मोहिनी एकादशी व्रत: मोक्ष का मार्ग दिलाता है

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आज मोहिनी एकादशी का व्रत है। आज भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की पूजा का विधान पद्म पुराण में बताया गया है। मान्यता है कि जो भक्त मोहिनी एकादशी का व्रत करके भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करते हैं, वह सांसारिक मोह-माया, पाप बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष को का प्राप्त करता है। धर्म-ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत का संकल्प करके कथा करने पर ही पूजा का फल प्राप्त होता है।

व्रत कथा

युधिष्ठिर ने पूछा कि जनार्दन! वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? उसका क्या फल होता है तथा उसके लिये कौन-सी विधि है? भगवान् श्रीवफढष्ण बोले कि पूर्वकाल में परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्र ने महर्षि वसिष्ठ से यही बात पूछी थी, जिसे आज तुम मुझसे पूछ रहे हो। श्रीराम ने कहा था कि भगवन्! जो समस्त पापों का क्षय तथा सब प्रकार के दुःखों का निवारण करने वाला व्रतों में उत्तम व्रत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूं।

वसिष्ठ जी बोले कि श्रीराम! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम मोहिनी है। उसके प्रभाव से मनुष्य मोह-जाल से छुटकारा पाता है। सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नामक सुंदर नगर है। वहां चन्द्रवंशी द्युतिमान राजा का शासन था। उसी नगर में धनपाल नामक एक वैश्य रहता था। वह सदा पुण्यकर्म करता था। दूसरों के लिए कुआं, मठ, बगीचा, पोखर और घर बनवाया करता था।

वह भगवान् श्रीविष्णु की भक्ति में लगा रहता था। उसके पांच पुत्र थे- सुमना, द्युतिमान्, मेधावी, सुवफढत तथा धफष्टबुद्धि। सबसे छोटा पुत्र धफष्टबुद्धि महा पापी था। उसकी दुर्व्यसनों में आसक्ति थी। वह वैश्याओं से मिलने के लिए लालायित रहता था। उसकी बुद्धि न तो देवताओं के पूजन में लगती थी और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सत्कार में। वह दुष्टात्मा अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बर्बाद कर रहा था।

एक दिन वह वेश्या के साथ चौराहे पर घूमता दिखा तो पिता ने उसे घर से निकाल दिया। बंधु-बांधवों ने भी उसका परित्याग कर दिया। अब वह दिन-रात दुःख और शोक में डूबा भटकने लगा। एक दिन किसी पुण्य के उदय होने से वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम में पहुंचा। वैशाख का महीना था। कौण्डिन्य गंगाजी में स्नान करके आ रहे थे। धफष्टबुद्धि उनके पास गया और हाथ जोड़कर बोला- द्विजश्रेष्ठ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताएं, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।

कौण्डिन्य बोले- वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में मोहिनी एकादशी का व्रत करो। इस उपवास से प्राणियों के अनेक जन्मों के किये हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। वसिष्ठजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र! मुनि का यह वचन सुनकर धफष्टबुद्धि का चित्त प्रसन्न हो गया। उसने कौण्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया।

नफपश्रेष्ठ! इस व्रत के करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरूढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया। इस प्रकार यह मोहिनी का व्रत बहुत उत्तम है। इसके पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।

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