आ रही गहरे षड्यंत्र की बू, आखिर चाहते क्या हैं मोहम्मद यूनुस?
हालांकि इस प्रकार की हत्याएं, अव्यवस्था या अशांति किसी भी देश का आंतरिक मामला है और इसमें भारत या किसी भी विदेशी ताकत को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है लेकिन अपने हितों की रक्षा का हक तो है। यद्यपि सरकार ने बांग्लादेश एवं पाकिस्तान से लगती सीमाओं पर चौकसी बढ़ाई है लेकिन फिर भी कहीं अधिक सतर्कता और सावधानी के साथ इस षड्यंत्र को समझने,उसकी तह तक जाने और उसकी काट ढूंढने की कूटनीति पर काम करने की भी सख़्त जरूरत है।
दीपू चंद्र दास और अमृत मंडल के बाद एक और हिंदू खोखनचंद्र दास की बांग्लादेश में हत्या कर दी गई है। अभी तक वहां अल्पसंख्यक हिंदू केवल तात्कालिक ख़तरा महसूस कर रहे थे लेकिन अब एक भय का माहौल उनके बीच पसरता दिखाई दे रहा है। छात्र नेता उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश किस मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है वह एक बहुत बड़ा और खतरनाक संकेत है।
जिस तरह 2024 में अगस्त में युवाछात्र की आंदोलन के चलते हुए स्थितियां इतनी बिगड़ी की वहां की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद को भारत में शरण लेनी पड़ी वह कुछ-कुछ बाद में नेपाल में हुए जेन जी आंदोलन का ही एक पूर्वांक यानी प्रीक्वेल दिखाई पड़ता है । शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद वहां की सत्ता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं ग्रामीण बैंक के संस्थापक तथा शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस इस उम्मीद के साथ अल्पकाल के लिए सौंपी गई थी कि वे वहां पर न केवल शांति स्थापित करेंगे अपितु अव्यस्था की ओर बढ़ रहे बांग्लादेश को फिर से पटरी पर लाकर वहां लोकतंत्र की परिपाटी को मजबूत करेंगे लेकिन हाल-फिलहाल तो ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है।
1971 में आजाद होने के बाद शेख मुजीबुर्रहमान ने पहले वहां के राष्ट्रपति एवं बाद प्रधानमंत्री के पद संभाले तब लगा था कि पाकिस्तानी अत्याचारों से मुक्ति के बाद बांग्लादेश अब लोकतंत्र की स्वस्थ शासन में फले फूलेगा लेकिन केवल 4 साल बाद ही 1975 में एक सैनिक षड्यंत्र के तहत शेख मुजीबुर्रहमान की सपरिवार हत्या कर दी गई केवल उनकी दो बेटियां जिनमें एक शेख हसीना है इसलिए बच गई कि वे वहां नहीं थी ।
लेफ्टिनेंट जनरल इरशाद ने सत्ता संभाली और कट्टरता बढ़ाई
उसके बाद एक अल्पकालीन सरकार खोंडकर मुश्ताक के नेतृत्व में बनी उसका पतन भी एक सैन्यतख्ता पलट में मेजर जनरल जियाउर्रहमान के नेतृत्व में हुआ और 1981 में चटगांव दौरे के दौरान मार डाले गए। एक बार फिर अल्पकालिक सरकारों के बाद सत्ता पर लेफ्टिनेंट जनरल इरशाद ने कब्जा किया और सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए बांग्लादेश को इस्लामिक कट्टरता की ओर धकेल दिया लेकिन दो शत्रु राजनीतिज्ञों खालिदा जिया और शेख हसीना आपस में मिल गए और इरशाद को भी 1990 में सत्ता गंवानी पड़ी।
इरशाद के पतन के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र का एक लंबा दौर चला और वहां पर सत्ता खालिदा जिया और शेख हसीना के बीच बदलती बदलती रही। 80 साल की उम्र में 28 दिसंबर 2025 को अपनी जीवन लीला पूरी करने वाली खालिदा जिया 10 साल 1991 से 1996 और 2001 से 2006 तक प्रधानमंत्री रहीं जबकि शेख मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना 1996 से 2001 तक और उसके बाद थोड़ी उथल-पुथल के साथ 2009 से 2024 तक बांग्लादेश की सबसे सशक्त नेता बनकर उभरीं। उनकी इस ताकत के पीछे जहां उनके पिता का प्रभामंडल था वहीं उनका भारत के प्रति झुकाव और भारत का उनके प्रति समर्थन भी एक प्रमुख कारक था लेकिन अगस्त 2024 में उनकी सरकार का भी तख्तापलट हुआ और तब से अब तक बांग्लादेश लोकतंत्र और शांति की प्रतीक्षा में है।
चुनाव टालने की आशंका में यूनुस की नीति और नीयत पर सवाल
मोहम्मद यूनुस ने वादा किया हुआ है कि मार्च 2026 तक में चुनाव करके एक लोकतांत्रिक ढंग से चुने हुए सरकार को सत्ता सौंप कर एक तरफ हो जाएंगे और वह समय अब करीब-करीब आ गया है लेकिन इस बीच मोहम्मद यूनुस की नीति और नीयत दोनों पर ही शक भी उभर रहा है। खालिदा जिया की मृत्यु एवं तारीक रहमान की बांग्लादेश वापसी के बाद राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि यह सारा खेल यूनुस के ही इशारों पर खेला जा रहा है ताकि चुनाव को टाला जा सके एवं सत्ता पर खुद या अपने खास मोहरों को बैठाया जा सके।
शेख हसीना हसीना को बांग्लादेश के न्यायालय द्वारा फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी वतन वापसी अभी तो असंभव सी हो गई है उनकी पार्टी बांग्लादेश अवामी लीग को पहले ही बांग्लादेश के चुनाव से अलग कर दिया गया है और यूनुस का झुकाव बांग्लादेश के कट्टरवादी दल जमाते इस्लामी की ओर साफ-साफ दिखाई देता है। इस दल की बढ़ी हुई गतिविधियों के बरक्स ही अल्पसंख्यक हिंदुओं के प्रति नफरत का सैलाब सा उभर आया है।
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मोहम्मद यूनुस की सरकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में निष्क्रिय
आज़ादी के समय बांग्लादेश में 22 प्रतिशत हिंदू थे जो 1974 की जनगणना के समय 13.5 प्रतिशत दर्ज किए गए और आज वहां पर केवल 7.9 प्रतिशत हिंदू ही बचे हैं और उनका भी जीवन, परिवार संपत्ति व व्यापार सब कुछ दांव पर लगा है लेकिन मोहम्मद यूनुस की सरकार आगे बढ़कर कोई कड़ा कदम उठाने की नहीं हिम्मत कर पा रही है और न ही इतनी सामर्थ्य है उसमें लगती है कि वह कुछ कर पाए।
यहां सवाल केवल बांग्लादेश का नहीं अपितु पूरे दक्षिण एशिया में जिस तरह एक हिंदू विरोधी लहर उठी हुई है वह चिंता का विषय है। यदि गहराई में जाएं तो साफ-साफ यह है एक राजनीतिक वैमनस्य के शिखर पर चढ़ने जैसा है। पिछले कुछ ही वर्षों में पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ-साथ मलेशिया और इंडोनेशिया में भी हिंदू विरोधी लहर दिखाई दी है। नफरत के इस खेल में पाकिस्तान के 15 प्रतिशत हिंदू अब केवल दो प्रतिशत बचे हैं और कट्टरतावादी तत्व उन्हें भी वहां से भगाने, मारने पर तुले हैं कहीं यह एक सोची-समझी रणनीति का तो हिस्सा नहीं है?
दक्षिण एशिया में हिंदू पलायन से बदलता जनसांख्यिकीय संतुलन
यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो फिर दक्षिण एशिया में जनसांख्यिकी बदलाव साफ-साफ देखा जा सकता है और ऐसी स्थिति में जब बांग्लादेश, श्रीलंका या पाकिस्तान में हिंदुओं को सताया जाएगा, मारा जाएगा तब स्वाभाविक रूप से उनकी शरणस्थली केवल भारत ही बनेगा तब यहां पर हिंदुओं की संख्या में इज़ाफा होगा और आनुपातिक रूप से मुसलमान जनसंख्या का ग्राफ नीचे जाता दिखाई देगा यानी तब विपक्षी या इस डेमोग्राफिक चेंज के कर्ताधर्ता भारत पर भी अल्पसंख्यक मुसलमानों के दमन एवं शोषण का आरोप कहीं अधिक तार्किक आंकड़ों के साथ लगा सकेंगे। तो लगता है कि कट्टरतावादी ताकतें भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को चोट पहुंचाने के लिए सुनियोजित तरीके सेइस षड्यंत्र को हवा दे रहे हैं।

हालांकि इस प्रकार की हत्याएं, अव्यवस्था या अशांति किसी भी देश का आंतरिक मामला है और इसमें भारत या किसी भी विदेशी ताकत को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है लेकिन अपने हितों की रक्षा का हक तो है। यद्यपि सरकार ने बांग्लादेश एवं पाकिस्तान से लगती सीमाओं पर चौकसी बढ़ाई है लेकिन फिर भी कहीं अधिक सतर्कता और सावधानी के साथ इस षड्यंत्र को समझने,उसकी तह तक जाने और उसकी काट ढूंढने की कूटनीति पर काम करने की भी सख़्त जरूरत है।
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