श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध है

श्राद्ध का अर्थ है- श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य, जिससे पितरों को शांति मिलती है। श्राद्ध की उत्पत्ति पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता से हुई है जिसकी शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है। महाभारत के अनुसार सबसे पहले महर्षि निमि ने अत्रि मुनि के उपदेश से श्राद्ध किया था। श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार-स्थूल शरीर के लिए करते हैं।

इसलिए शास्त्र पूर्व जन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित करते हैं। सभी संस्कारों विवाह को छोड़कर श्राद्ध ही ऐसा धार्मिक कृत्य है जिसे लोग पर्याप्त धार्मिक उत्साह से करते हैं। आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस ऊर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है।

आत्मा की अमरता और श्राद्ध का वैज्ञानिक आधार

धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुंदर और वैज्ञानिक विवेचन मिलता है। पुराणों के अनुसार पितृपक्ष में जो तर्पण किया जाता है, उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जौ तथा चावल का पिण्ड देता है। उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है।

श्राद्ध का वैज्ञानिक पहलू भी है। वेदों व दर्शन शास्त्रां आदि में ऋषियों-मनीषियों ने इस विषय पर विस्तृत विचार किया है। श्रीमद्भागवत गीता में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। शरीर नष्ट होता है, मगर आत्मा कभी नष्ट नहीं होती है।

वह बार-बार जन्म लेती है। इस पुन जन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्धदि कर्म का विधान निर्मित किया गया है। हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्रीरामचरित में श्रीराम द्वारा राजा दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख है। भरत द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख तुलसी की मानस में हुआ है।

गया में पिंडदान का महत्व और श्रद्धा से जुड़ा भाव

विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति केवल मोटा अन्न, जंगली साग, फल और न्यूनतम दक्षिणा यदि वह भी ना हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए या किसी गाय को घास खिला देनी चाहिए। अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।

यह भी पढ़े : संत नामदेव ने बताई राम नाम महिमा

-रमेश सर्राफ धमोरा

शास्त्रां में पितरों के लिए पितृपक्ष के दौरान पिंडदान करने का महत्व बताया गया है। मान्यता है कि गया जी में श्राद्ध कर्मकांड सृष्टि के रचना काल से शुरू है। वायु पुराण, अग्नि पुराण तथा गरूड़ पुराण में गया तीर्थ का वर्णन है। भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी पर आकर फल्गु नदी में प्रेतशिला पर पिंडदान किया था। त्रेता युग में भी भगवान श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ के मरणोपरांत फल्गु नदी के तट पर श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, कर्मकांडकर पितृऋण से मुक्त हुए थे।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button